दिल्ली –जंतर-मंतर हिंसा: अचानक भड़का प्रदर्शन या पहले से रची गई साजिश? दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आ रहे चौंकाने वाले पहलू

20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हुई हिंसा की गूंज अब भी थमी नहीं है। घटना को करीब दो सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी बरकरार है—क्या यह प्रदर्शन अचानक बेकाबू हुई भीड़ का परिणाम था या इसके पीछे पहले से रची गई कोई सुनियोजित साजिश थी? इसी सवाल का जवाब तलाशने में दिल्ली पुलिस और जांच एजेंसियां दिन-रात जुटी हुई हैं। पुलिस अब इस पूरे घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था भंग होने की घटना नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक साजिश के एंगल से भी जांच रही है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (एफआरएस), सोशल मीडिया गतिविधियां, डिजिटल फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जोड़कर घटना की एक-एक कड़ी खंगाली जा रही है। पुलिस का दावा है कि फेस रिकॉग्निशन सिस्टम के जरिए अब तक 2,873 लोगों की पहचान की गई है, जिनमें 989 लोगों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड होने की बात कही गई है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच जारी है। घटना वाले दिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के बाद भीड़ ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, जबकि उस समय मानसून सत्र चल रहा था और क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू थी। सुरक्षा के लिए कई स्तर की बैरिकेडिंग की गई थी, लेकिन पुलिस के अनुसार कुछ लोगों ने बैरिकेड हटाने का प्रयास किया, जिसके बाद तनाव तेजी से हिंसा में बदल

गया। पुलिस का आरोप है कि उस दौरान पथराव हुआ, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, बैरिकेड तोड़े गए और वाहनों में तोड़फोड़ की गई। हालात काबू से बाहर होने पर पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और रैपिड एक्शन फोर्स की मदद से भीड़ को तितर-बितर किया। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक कुछ प्रदर्शनकारी संसद भवन के प्रवेश क्षेत्र के बेहद करीब तक पहुंच गए थे, जिसके बाद संसद परिसर में तैनात सीआईएसएफ जवानों को हाई अलर्ट पर रखा गया। पुलिस के अनुसार 21 से 25 जुलाई के बीच भी राजधानी के अलग-अलग इलाकों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए, जिनमें कई वरिष्ठ अधिकारी समेत लगभग 250 पुलिसकर्मी घायल हुए। सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचा, जिसमें 100 से अधिक बैरिकेड, सैकड़ों बॉडी प्रोटेक्टर, हेलमेट, दंगा-रोधी शील्ड, लाउड हेलर और कई सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त होने की बात कही गई है। पूरे मामले में 20 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं और दंगा, सरकारी संपत्ति को नुकसान, हत्या के प्रयास, पुलिस पर हमला, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने के प्रयास तथा आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराओं के तहत जांच आगे बढ़ रही है। पुलिस उन लोगों की भी पहचान करने की कोशिश कर रही है जो मास्क और सुरक्षात्मक उपकरण पहनकर आए थे, जबकि करीब 400 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनलों, मोबाइल चैट तथा डिजिटल डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है। जांच एजेंसियां कुछ राजनीतिक संगठनों और अन्य समूहों की संभावित भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं, लेकिन अब तक किसी संगठन या व्यक्ति की भूमिका पर कोई आधिकारिक निष्कर्ष घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं और उनका जवाब जांच पूरी होने तथा अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएगा। तब तक यह मामला केवल एक हिंसक प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश की राजधानी की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और संभावित साजिश की परतों को खोलने वाली सबसे चर्चित जांचों में से एक बना हुआ है।