शीर्षक: रील्स की चमक और अपनों की खामोश चीख.....क्या हमने फोन को अपना सब कुछ मान लिया है?
शाम की हल्की रोशनी जब ड्राइंग रूम की खिड़की से अंदर आती है, तो अमूमन वहाँ चाय की कपों की खनक, हँसी-मजाक और दिनभर के हाल-चाल गूँजा करते थे। लेकिन आज उस कमरे में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा पसरा रहता है। सन्नाटा इस बात का नहीं कि वहाँ कोई नहीं है—वहाँ पूरा परिवार मौजूद है। माँ एक कोने में बैठी हैं, पिता जी दूसरे कोने में, और बेटा-बेटी अपनी-अपनी दुनिया में गुम हैं। अजीब बात यह है कि कोई किसी से बात नहीं कर रहा, सबके हाथों में स्क्रीन जल रही है, और मोबाइल की नीली रोशनी उनके चेहरों पर एक अजीब सा वीरानपन और कृत्रिम चमक छोड़ रही है।
हम एक ऐसी डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ अपनों से चंद कदम की दूरी पर बैठकर हम उन्हें रील्स भेजते हैं। सोचकर देखिए, यह आधुनिकता का कौन सा भयानक मुकाम है, जहाँ अपनों के जज़्बात, उनकी मुस्कान और उनके आंसुओं से ज्यादा कीमती हमारे लिए कुछ सेकंड के वीडियो पर मिलने वाले 'लाइक्स' और 'व्यूज' हो गए हैं।
(स्क्रीन की चकाचौंध में खोता अपनापन)
याद कीजिए वो दौर जब घरों में संवाद ही सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करता था। लोग एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करते थे, चेहरे के भाव पढ़कर समझ जाते थे कि अंदर क्या तूफान चल रहा है। आज? आज हम स्क्रीन के उस पार बैठे किसी अनजान अजनबी के रोने पर तो दिल (❤️) वाला इमोजी भेज देते हैं, लेकिन अपने ही घर में सुबक रही माँ की आँखों के कोने में जमी नमी हमें नजर नहीं आती।
कल शाम की ही तो बात है। एक बुजुर्ग पिता ने अपने युवा बेटे से कहा, "ेटा, थोड़ी देर फोन रख दे, ज़रा साथ बैठकर बात कर।" बेटे की उंगलियाँ स्क्रीन पर तेज़ी से चल रही थीं, बिना नजर उठाए उसने एक रील का लिंक पिता के व्हाट्सएप पर भेज दिया और बेरुखी से बोला, "पापा, यह वाला देखो, बहुत फनी है, बाद में बात करते हैं।"
उस बूढ़े बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी? उस पिता ने, जिसने अपनी पूरी जवानी उस बेटे की उंगली थामकर उसे चलना सिखाने में बिता दी, आज बुढ़ापे में दो मिनट की तवज्जो के लिए एक वर्चुअल लिंक का मोहताज हो गया। क्या इसी दिन के लिए उसने अपने अरमानों का गला घोंटा था?
(फॉलोअर्स' की भीड़ और अपनों का अकेलापन)
आज हमारी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। इंस्टाग्राम और फेसबुक के 'फॉलुअर्स' हमारी हकीकत बन चुके हैं। हम इस भ्रम में जी रहे हैं कि जितने ज्यादा लोग हमें स्क्रीन पर देख रहे हैं, हम उतने ही लोकप्रिय और खुश हैं। लेकिन यह डिजिटल लोकप्रियता एक छलावा है, एक ऐसा नशा है जो धीरे-धीरे हमें अपनों से काट रहा है।
हम वर्चुअल दुनिया में दूसरों को हँसाने और प्रभावित करने के चक्कर में अपने घर के अंदर के लोगों को रुला रहे हैं। एक पत्नी दिनभर रील्स बनाने की जुगत में लगी रहती है—कौन सा ट्रेंडिंग गाना चल रहा है, किस पर वीडियो बनानी है। पति अपने ऑफिस के तनाव से चूर होकर घर लौटता है, तो उसे सुकून का एक कंधा मिलने के बजाय कैमरे के सामने पोज देने को कहा जाता है। रिश्तों की ऊष्मा अब लाइक और कमेंट के काउंटर पर आकर दम तोड़ रही है।
( जब तक अहसास होगा, बहुत देर हो चुकी होगी )
तकनीक दुश्मन नहीं है, दुश्मन हमारा अतिरेक है। मोबाइल ने दुनिया को छोटा किया है, लेकिन हमारे घरों के दिलों को बहुत दूर कर दिया है।
हम यह भूल रहे हैं कि जिंदगी कोई रील्स की फीड नहीं है, जिसे स्वाइप करके अगला पन्ना पलटा जा सके। जो लोग आज हमारे पास हैं, जो माँ-बाप हमारे लौटने का इंतजार करते हैं, जो जीवनसाथी हमारी एक मीठी मुस्कान को तरसता है—वे हमेशा के लिए यहाँ नहीं रहने वाले।
एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे पास लाखों फॉलोअर्स होंगे, बैंक खाते में पैसे होंगे, मोबाइल की गैलरी हजारों वीडियो से भरी होगी, लेकिन जब हम मुड़कर देखेंगे तो घर का वह कमरा खाली मिलेगा। तब कोई हमें रील्स भेजने वाला नहीं होगा, कोई हमारी पोस्ट पर लाइक करने वाला नहीं होगा। बस पछतावे के सिवाय हाथ कुछ नहीं लगेगा।
आज इस लेख को पढ़ते-पढ़ते खुद से एक सवाल पूछिए—क्या वाकई हमने अपने अपونों को उस स्क्रीन के हवाले कर दिया है, जिसकी कोई रूह नहीं होती?
वक्त अभी भी पूरी तरह से नहीं फिसला है। आज ही, बल्कि इसी वक्त, अपने हाथ से उस फोन को नीचे रखिए। पास बैठे अपने पिता का हाथ थामिए, अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर पूछिए कि वे कैसे हैं, अपने बच्चों के साथ बिना फोन के दो पल खुलकर हँसिए
क्योंकि अंत में, न कोई रील साथ जाएगी, न कोई लाइक मायने रखेगा—सिर्फ और सिर्फ अपनों का साथ और उनके चेहरों की सच्ची मुस्कान ही हमारी असली पूंजी है। फोन को अपना मालिक मत बनने दीजिए, इसे सिर्फ एक उपकरण ही रहने दीजिए। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, अपनी इस खूबसूरत जिंदगी को रील्स के फ्रेम से बाहर निकालिए और अपनों को गले लगा लीजिए।