Monday, August 3, 2026

पृथ्वीराज चौहान की वह जंग जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए


तराइन का दूसरा युद्ध (1192 ई.) – जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी



भारतीय इतिहास में कई युद्ध ऐसे हुए जिन्होंने केवल दो सेनाओं के बीच जीत-हार का फैसला नहीं किया, बल्कि पूरे देश के भविष्य को प्रभावित किया। ऐसा ही एक युद्ध था 1192 ईस्वी में लड़ा गया तराइन का दूसरा युद्ध, जिसमें दिल्ली और अजमेर के शक्तिशाली शासक पृथ्वीराज चौहान का सामना मोहम्मद गौरी से हुआ। इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध के परिणाम ने उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था को गहराई से बदल दिया। आज भी यह युद्ध वीरता, रणनीति, साहस और इतिहास से मिलने वाली सीख के कारण विशेष महत्व रखता है।


पृथ्वीराज चौहान अपने समय के सबसे शक्तिशाली राजपूत शासकों में गिने जाते थे। उनकी राजधानी अजमेर और दिल्ली तक फैली हुई थी। दूसरी ओर, मध्य एशिया से आया मोहम्मद गौरी भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। वर्ष 1191 में दोनों सेनाओं के बीच तराइन का पहला युद्ध हुआ, जिसमें पृथ्वीराज चौहान की सेना ने गौरी को पराजित किया। कहा जाता है कि इस हार के बाद गौरी पीछे हट गया, लेकिन उसने अपनी पराजय को अंतिम नहीं माना। उसने अपनी सेना को फिर से संगठित किया, नई रणनीति बनाई और अगले ही वर्ष पहले से अधिक तैयारी के साथ भारत लौट आया।


वर्ष 1192 में तराइन के मैदान में दोनों सेनाएं एक बार फिर आमने-सामने थीं। पृथ्वीराज चौहान की सेना में बड़ी संख्या में राजपूत योद्धा, घुड़सवार और हाथी थे, जबकि मोहम्मद गौरी की सेना तेज गति से चलने वाली घुड़सवार टुकड़ियों और तीरंदाजों से सुसज्जित थी। युद्ध के दौरान गौरी ने ऐसी रणनीति अपनाई जिसमें उसकी सेना बार-बार हमला कर पीछे हटती और फिर अचानक चारों ओर से घेरकर आक्रमण करती। लंबे संघर्ष के बाद राजपूत सेना की व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी और अंततः पृथ्वीराज चौहान को पराजय का सामना करना पड़ा।


तराइन के दूसरे युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसके बाद उत्तर भारत की सत्ता का संतुलन तेजी से बदल गया। पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद मोहम्मद गौरी का प्रभाव दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच गया। आगे चलकर उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने शासन की नींव मजबूत की, जिससे दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। इतिहासकार इस युद्ध को इसलिए भी महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि इसके बाद उत्तर भारत की राजनीति, प्रशासन और सत्ता संरचना में बड़े परिवर्तन देखने को मिले।


पृथ्वीराज चौहान का नाम आज भी वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनके जीवन से जुड़ी कई लोककथाएं और साहित्यिक रचनाएं, विशेषकर पृथ्वीराज रासो, लोकप्रिय हैं। हालांकि इनमें वर्णित कुछ घटनाओं को इतिहासकार प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं मानते, इसलिए इतिहास और लोककथाओं के बीच अंतर समझना आवश्यक है। फिर भी यह निर्विवाद है कि पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास के प्रमुख योद्धाओं में से एक थे और उन्होंने अपने राज्य की रक्षा के लिए पूरी शक्ति से संघर्ष किया।


तराइन का दूसरा युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह हमें कई महत्वपूर्ण सीख भी देता है। यह बताता है कि युद्ध में केवल वीरता ही नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति, आधुनिक सैन्य कौशल और समय के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही आवश्यक होती है। इतिहास का अध्ययन हमें अतीत को समझने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी बेहतर निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।


आज, आठ सौ से अधिक वर्ष बाद भी तराइन का युद्ध इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के अध्ययन का प्रमुख विषय बना हुआ है। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल बीते समय की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए सीख का स्रोत भी है। पृथ्वीराज चौहान का साहस और संघर्ष भारतीय इतिहास की अमूल्य विरासत का हिस्सा है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सही और तथ्यपरक रूप में पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी

रंग-बिरंगे पंखों से गूंजता छत्तीसगढ़ का जंगल | पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग

 अचानकमार के पक्षी: रंग-बिरंगे पंखों से गूंजता छत्तीसगढ़ का जंगल | पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग




बिलासपुर –जब भी अचानकमार टाइगर रिजर्व का नाम लिया जाता है, लोगों के मन में सबसे पहले बाघ, तेंदुआ और घने साल के जंगलों की तस्वीर उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह क्षेत्र पक्षियों की दुनिया का भी एक अनमोल खजाना है। यहां सुबह की पहली किरण के साथ जंगल पक्षियों की मधुर आवाज़ से जीवंत हो उठता है। पेड़ों की ऊंची शाखाओं, नदी-नालों के किनारों और घास के मैदानों में सैकड़ों पक्षी प्रजातियां अपना बसेरा बनाती हैं।


छत्तीसगढ़ के मुंगेली और बिलासपुर जिलों से जुड़े अचानकमार टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा घने साल, साजा, बीजा और मिश्रित वनों से आच्छादित है। यही कारण है कि यह क्षेत्र देश के प्रमुख बर्ड वॉचिंग स्थलों में गिना जाता है। यहां वर्षभर 150 से अधिक पक्षी प्रजातियां देखी जा सकती हैं। इनमें स्थानीय, दुर्लभ और कुछ प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं।


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पक्षियों के लिए स्वर्ग क्यों है अचानकमार?


अचानकमार में पक्षियों के लिए आदर्श वातावरण उपलब्ध है। यहां घने जंगल, पहाड़ियां, छोटी-बड़ी नदियां, प्राकृतिक जल स्रोत और शांत वातावरण उन्हें सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं। जंगल की जैव विविधता पक्षियों को भोजन, घोंसले बनाने के लिए स्थान और प्रजनन का अनुकूल वातावरण देती है।


यही कारण है कि वर्ष के अलग-अलग मौसमों में यहां अनेक प्रजातियों के पक्षी आसानी से देखे जा सकते हैं।


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1. भारतीय मोर (Indian Peafowl)


भारतीय मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और अचानकमार के जंगलों में बड़ी संख्या में पाया जाता है।


बरसात के मौसम में जब मोर अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नृत्य करता है तो यह दृश्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।


वैज्ञानिक नाम: Pavo cristatus

भोजन: बीज, फल, कीट और छोटे जीव।

विशेषता: बारिश से पहले नृत्य करना इसकी पहचान है।


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2. ग्रेट हॉर्नबिल (Great Hornbill)


अचानकमार का सबसे आकर्षक पक्षी ग्रेट हॉर्नबिल माना जाता है। इसकी बड़ी पीली चोंच और सिर के ऊपर हेलमेट जैसी संरचना इसे बेहद अलग पहचान देती है।


यह मुख्य रूप से बड़े वृक्षों वाले जंगलों में पाया जाता है और बीज फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


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3. क्रेस्टेड सर्प ईगल (Crested Serpent Eagle)


यह शिकारी पक्षी अपनी तेज नजर और ऊंची उड़ान के लिए प्रसिद्ध है।


इसका मुख्य भोजन सांप, छिपकलियां और छोटे जीव होते हैं।


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4. किंगफिशर (Kingfisher)


अचानकमार की नदियों और तालाबों के किनारे नीले और नारंगी रंग का किंगफिशर अक्सर दिखाई देता है।


यह पानी में गोता लगाकर मछलियों का शिकार करता है।


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5. कठफोड़वा (Woodpecker)


घने जंगलों में पेड़ों के तनों पर लगातार चोंच मारने की आवाज़ सुनाई दे तो समझिए आसपास कठफोड़वा मौजूद है।


यह पेड़ों की छाल के भीतर छिपे कीड़ों को निकालकर खाता है।


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6. ड्रोंगो (Drongo)


ड्रोंगो अपनी बहादुरी और नकल करने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है।


यह बड़े शिकारी पक्षियों को भी परेशान कर अपने क्षेत्र की रक्षा करता है।


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7. बुलबुल (Bulbul)


सुबह के समय बुलबुल की मधुर आवाज़ पूरे जंगल को संगीत से भर देती है।


यह फल, फूलों का रस और छोटे कीट खाती है।


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8. तोता (Parakeet)


हरे रंग के तोते अचानकमार के साल और सागौन के पेड़ों पर झुंड में दिखाई देते हैं।


इनकी तेज आवाज़ जंगल में दूर तक सुनाई देती है।


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9. उल्लू (Owl)


रात के समय सक्रिय रहने वाला उल्लू जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


यह चूहों और छोटे जीवों की संख्या नियंत्रित करता है।


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10. प्रवासी पक्षी


सर्दियों के मौसम में कुछ प्रवासी पक्षी भी अचानकमार पहुंचते हैं। ये हजारों किलोमीटर की यात्रा कर यहां के जल स्रोतों और सुरक्षित वातावरण में समय बिताते हैं।


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पक्षियों की सुरक्षा क्यों जरूरी है?


पक्षी केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


- बीजों का प्रसार करते हैं।

- कीटों की संख्या नियंत्रित करते हैं।

- जंगल के स्वास्थ्य के संकेतक माने जाते हैं।

- परागण में भी योगदान देते हैं।


यदि पक्षियों की संख्या घटती है तो इसका असर पूरे जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।


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संरक्षण के प्रयास


अचानकमार टाइगर रिजर्व में पक्षियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए नियमित गश्त, जंगल की निगरानी, आग से बचाव और अवैध शिकार रोकने के प्रयास किए जाते हैं। स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी संरक्षण कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


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बर्ड वॉचिंग का सबसे अच्छा समय


अक्टूबर से मार्च का समय पक्षी प्रेमियों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। सुबह सूर्योदय के बाद और शाम को सूर्यास्त से पहले पक्षियों की गतिविधियां सबसे अधिक दिखाई देती हैं।


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पर्यटकों के लिए सुझाव


- पक्षियों को डराने के लिए तेज आवाज़ न करें।

- घोंसलों के पास न जाएं।

- प्लास्टिक और कचरा जंगल में न छोड़ें।

- दूरबीन और कैमरे का उपयोग करें।

- वन विभाग के नियमों का पालन करें।


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रोचक तथ्य


- अचानकमार में 150 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं।

- हॉर्नबिल को जंगल का "माली" कहा जाता है क्योंकि यह बीजों को दूर-दूर तक फैलाता है।

- भारतीय मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।

- ड्रोंगो कई पक्षियों की आवाज़ की नकल कर सकता है।

- उल्लू रात में भी बेहद सटीक तरीके से शिकार कर सकता है।


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निष्कर्ष


अचानकमार टाइगर रिजर्व केवल बाघों का घर नहीं, बल्कि पक्षियों की अनमोल दुनिया भी है। यहां का हर पेड़, हर नदी और हर जंगल का हिस्सा किसी न किसी पक्षी का आश्रय है। यदि हम इन पक्षियों और उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत जैव विविधता का आनंद ले सकेंगी। प्रकृति संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है।


(अगले भाग में पढ़िए: "अचानकमार के 20 सबसे दुर्लभ वन्यजीव – जिन्हें देखना किसी सौभाग्य से कम नहीं")

अचानकमार टाइगर रिजर्व : इतिहास, प्रकृति और संरक्षण का अद्भुत सफर (भाग–1)

 

अचानकमार टाइगर रिजर्व : इतिहास, प्रकृति और संरक्षण का अद्भुत सफर (भाग–1)


अचानकमार टाइगर रिजर्व : छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक धरोहर


छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, घने जंगलों और जैव विविधता के लिए पूरे देश में जाना जाता है। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में सबसे महत्वपूर्ण नाम है अचानकमार टाइगर रिजर्व। यह केवल बाघों का निवास स्थान नहीं, बल्कि हजारों प्रकार के वनस्पतियों, पक्षियों, स्तनधारियों, सरीसृपों और आदिवासी संस्कृति का जीवंत संसार है। मध्य भारत के घने साल के जंगलों के बीच स्थित यह क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।


आज अचानकमार टाइगर रिजर्व देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में गिना जाता है। यहां प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन इस स्थान का इतिहास केवल आधुनिक संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसका अतीत सदियों पुराना है, जब यह क्षेत्र घने जंगलों और वनवासी समुदायों के जीवन का आधार हुआ करता था।



अचानकमार नाम कैसे पड़ा?


"अचानकमार" नाम को लेकर कई स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं। सबसे अधिक प्रचलित मान्यता यह है कि बहुत पहले इस क्षेत्र में एक वन अधिकारी पर बाघ ने अचानक हमला कर दिया था। इस घटना के बाद लोगों ने इस स्थान को "अचानकमार" कहना शुरू कर दिया। समय के साथ यही नाम पूरे जंगल और बाद में अभयारण्य की पहचान बन गया।


हालांकि इतिहासकारों का मानना है कि इस नाम की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न स्थानीय कथाएं मौजूद हैं और किसी एक कथा को अंतिम ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता। फिर भी यह नाम आज पूरे देश में वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक बन चुका है।


भौगोलिक स्थिति


अचानकमार टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के मुंगेली और बिलासपुर जिलों में फैला हुआ है। इसका बड़ा भाग मैकल पर्वत श्रृंखला के घने जंगलों में स्थित है। यह क्षेत्र मध्य प्रदेश की सीमा से भी जुड़ा हुआ है और आगे चलकर कान्हा के जंगलों से पारिस्थितिक रूप से संबंध रखता है।


समुद्र तल से लगभग 300 मीटर से लेकर 1100 मीटर तक की ऊंचाई वाले इस क्षेत्र में पहाड़, घाटियां, छोटी-बड़ी नदियां, झरने और घने साल के जंगल इसकी प्राकृतिक सुंदरता को अद्भुत बनाते हैं।


जंगलों का प्राचीन इतिहास


हजारों वर्षों से यह क्षेत्र प्राकृतिक वन संपदा से समृद्ध रहा है। पुरातात्विक और ऐतिहासिक संकेत बताते हैं कि इस क्षेत्र में आदिवासी समुदाय लंबे समय से निवास करते आए हैं। बैगा, गोंड और अन्य जनजातियां जंगलों के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन बिताती रही हैं।


इन समुदायों के लिए जंगल केवल लकड़ी या ईंधन का स्रोत नहीं था, बल्कि भोजन, औषधि, जल, संस्कृति और आस्था का केंद्र था। पेड़-पौधों, नदियों और वन्यजीवों को वे प्रकृति का परिवार मानते थे।


ब्रिटिश काल और वन प्रबंधन


ब्रिटिश शासन के दौरान मध्य भारत के घने जंगलों का आर्थिक महत्व बढ़ गया। रेलवे के विस्तार और निर्माण कार्यों के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता थी। इसी कारण जंगलों का वैज्ञानिक प्रबंधन शुरू किया गया।


साल, सागौन और अन्य बहुमूल्य वृक्षों की पहचान की गई। वन विभाग की प्रारंभिक व्यवस्था विकसित हुई। हालांकि इस दौरान कई स्थानों पर अंधाधुंध कटाई भी हुई, जिससे प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हुआ।


धीरे-धीरे यह समझ विकसित हुई कि यदि जंगलों का संरक्षण नहीं किया गया तो वन्यजीवों और पर्यावरण दोनों को गंभीर नुकसान होगा।


स्वतंत्रता के बाद संरक्षण की दिशा


1947 में देश स्वतंत्र होने के बाद भारत सरकार ने वन संरक्षण पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। धीरे-धीरे विभिन्न राज्यों में वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना की गई।


अचानकमार क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को देखते हुए इसे विशेष संरक्षण देने की आवश्यकता महसूस हुई। यहां बाघ, तेंदुआ, गौर, भालू, सांभर, चीतल और अनेक दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती थीं। यही कारण था कि इसे संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।


वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना


सन् 1975 में अचानकमार को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया। इसका उद्देश्य तेजी से घटती वन्यजीव आबादी की रक्षा करना और जंगलों को सुरक्षित रखना था।


इसके बाद शिकार पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। वन सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई। वनकर्मियों की संख्या बढ़ाई गई और जंगलों की नियमित निगरानी शुरू हुई।


यहीं से अचानकमार के आधुनिक संरक्षण की वास्तविक यात्रा शुरू हुई।


जैव विविधता का खजाना


अचानकमार केवल बाघों के कारण प्रसिद्ध नहीं है। यहां सैकड़ों प्रकार के वृक्ष, औषधीय पौधे, पक्षी, तितलियां और अन्य जीव पाए जाते हैं।


घने साल के जंगल इस क्षेत्र की पहचान हैं। इनके अलावा साजा, बीजा, धावड़ा, तेंदू, महुआ, हर्रा, बहेरा, आंवला, अर्जुन, बांस और अनेक स्थानीय प्रजातियां यहां प्राकृतिक रूप से विकसित होती हैं।


यही वनस्पति यहां रहने वाले वन्यजीवों के लिए भोजन और आश्रय का प्रमुख आधार है।


नदियां और जल स्रोत


अचानकमार क्षेत्र अनेक छोटी-बड़ी नदियों और जलधाराओं का उद्गम स्थल माना जाता है। वर्षा के मौसम में यहां के झरने और पहाड़ी नाले पूरे जंगल को जीवन प्रदान करते हैं।


इन्हीं जल स्रोतों के कारण गर्मियों में भी वन्यजीवों को पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता है, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है।



अचानकमार टाइगर रिजर्व का इतिहास केवल एक जंगल की कहानी नहीं है, बल्कि प्रकृति, वन्यजीवों और मानव के सह-अस्तित्व का प्रेरणादायक उदाहरण है। सदियों पुराने जंगलों से लेकर आधुनिक संरक्षण तक इसकी यात्रा भारत की पर्यावरणीय सोच को भी दर्शाती है।


अगले भाग में पढ़िए: प्रोजेक्ट टाइगर, बाघों का इतिहास, यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व, वन्यजीव, पर्यटन, सफारी, आदिवासी जीवन और अचानकमार का वर्तमान स्वरूप.....

इतिहास, आधुनिक तकनीक और उपलब्धियों का संगम बना बिलासपुर जंक्शन, भारतीय रेलवे के सबसे अहम स्टेशनों में शुमार............

 इतिहास, आधुनिक तकनीक और उपलब्धियों का संगम बना बिलासपुर जंक्शन, भारतीय रेलवे के सबसे अहम स्टेशनों में शुमार............




बिलासपुर। छत्तीसगढ़ का बिलासपुर जंक्शन भारतीय रेलवे के सबसे महत्वपूर्ण रेल स्टेशनों में गिना जाता है। इसका इतिहास 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1889 में तत्कालीन नागपुर–छत्तीसगढ़ रेलवे की राजनांदगांव से बिलासपुर रेल लाइन शुरू होने के साथ इस स्टेशन का अस्तित्व सामने आया। बाद में इस रेलवे का संचालन बंगाल नागपुर रेलवे ने संभाला। वर्ष 1890 में स्टेशन भवन का निर्माण किया गया और 1891 में नागपुर–आसनसोल मुख्य रेलमार्ग शुरू होने के बाद बिलासपुर की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई। वर्ष 1900 में यह स्टेशन हावड़ा–नागपुर–मुंबई मुख्य रेलमार्ग का प्रमुख जंक्शन बन गया, जिसने देश के पूर्व, मध्य और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


समय के साथ बिलासपुर जंक्शन ने आधुनिक रेलवे अवसंरचना की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति की। रेलवे ने चरणबद्ध तरीके से विभिन्न रेलखंडों का विद्युतीकरण किया। राउरकेला–बिलासपुर रेलखंड का विद्युतीकरण वर्ष 1969–70 में, बिलासपुर–नागपुर रेलखंड का वर्ष 1976–77 में तथा बिलासपुर–कटनी रेलखंड का वर्ष 1981 में पूरा हुआ। इन परियोजनाओं ने माल और यात्री ट्रेनों के संचालन को अधिक तेज, सुरक्षित और ऊर्जा दक्ष बनाया, जिससे पूरे दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे नेटवर्क को नई गति मिली।


बिलासपुर की पहचान केवल एक व्यस्त रेलवे स्टेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े विद्युत इंजन केंद्रों में भी शामिल हो चुका है। वर्ष 2018 में बिलासपुर इलेक्ट्रिक लोको शेड का शुभारंभ किया गया। फरवरी 2026 तक यहां कुल 264 विद्युत इंजन संचालित थे, जिनमें 236 शक्तिशाली WAG-9 मालगाड़ी इंजन और 28 अत्याधुनिक 12,000 हॉर्सपावर क्षमता वाले EF12K इंजन शामिल हैं। यह लोको शेड दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की माल परिवहन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय रेलवे की परिचालन व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहा है।


यात्री सुविधाओं और रेल परिचालन की दृष्टि से भी बिलासपुर जंक्शन देश के सबसे व्यस्त स्टेशनों में शामिल है। भारतीय रेलवे के शीर्ष 100 टिकट बुकिंग स्टेशनों में इसकी गणना होती है। प्रतिदिन लगभग 340 यात्री और मालगाड़ियां इस स्टेशन से होकर गुजरती हैं। यहां से बिलासपुर राजधानी एक्सप्रेस, कलिंगा उत्कल एक्सप्रेस, आजाद हिंद एक्सप्रेस, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस, छत्तीसगढ़ संपर्क क्रांति सुपरफास्ट, ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस, हावड़ा–मुंबई मेल, बिलासपुर–चेन्नई सुपरफास्ट, एर्नाकुलम–बिलासपुर एक्सप्रेस, तिरुनेलवेली–बिलासपुर एक्सप्रेस तथा बिलासपुर–नागपुर वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी कई महत्वपूर्ण ट्रेनें संचालित होती हैं, जो देश के प्रमुख शहरों को बिलासपुर से जोड़ती हैं।


बिलासपुर जंक्शन ने स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। वर्ष 2015–16 के रेलवे स्वच्छता सर्वेक्षण में इसे भारत का तीसरा सबसे स्वच्छ रेलवे स्टेशन तथा सभी जोनल मुख्यालय स्टेशनों में सबसे स्वच्छ स्टेशन का सम्मान प्राप्त हुआ। इसके अलावा यहां स्थित रेलवे प्लेटफॉर्म देश के सबसे लंबे प्लेटफॉर्मों में से एक है, जो बड़े पैमाने पर यात्री और रेल संचालन को सुचारु रूप से संभालने में सक्षम है।


इतिहास, आधुनिक तकनीक, विशाल रेल नेटवर्क, अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक लोको शेड, उत्कृष्ट स्वच्छता और देशव्यापी रेल संपर्क जैसी अनेक विशेषताओं के कारण बिलासपुर जंक्शन भारतीय रेलवे का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय होने के कारण यह स्टेशन न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश की रेल व्यवस्था में रणनीतिक भूमिका निभा रहा है। लगातार बढ़ते यात्री भार, आधुनिक सुविधाओं के विस्तार और नई तकनीकों के समावेश के साथ बिलासपुर जंक्शन भविष्य में भी भारतीय रेलवे के प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण रेल केंद्रों में अपनी पहचान बनाए रखने की दिशा में अग्रसर है।

कवच', दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के 2430 किमी नेटवर्क पर दौड़ेगी हाईटेक सुरक्षा.......



रेल सुरक्षा में नई क्रांति का 'कवच', दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के 2430 किमी नेटवर्क पर दौड़ेगी हाईटेक सुरक्षा.......


बिलासपुर :–भारतीय रेलवे अब सुरक्षा के उस नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां मानवीय भूल से होने वाली रेल दुर्घटनाओं पर अत्याधुनिक तकनीक के जरिए प्रभावी रोक लगाई जाएगी। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे अपने पूरे 2430 रूट किलोमीटर नेटवर्क पर स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम 'कवच' को लागू करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। रेलवे संचार व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई जा रही है, आधुनिक संचार टावर स्थापित किए जा रहे हैं और लोकोमोटिवों में कवच उपकरण फिट किए जा रहे हैं। अब तक 238 इंजनों में यह प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। यह परियोजना केवल तकनीकी उन्नयन नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे के सुरक्षा इतिहास में एक बड़ा बदलाव मानी जा रही है, जिससे लाखों यात्रियों का सफर पहले से कहीं अधिक सुरक्षित, भरोसेमंद और आधुनिक होगा।



बिलासपुर मंडल में बिलासपुर–रायगढ़ रेलखंड पर कवच की कमीशनिंग का कार्य तेजी से चल रहा है, जबकि बिलासपुर–चांपा रेलखंड में फील्ड परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं। नागपुर मंडल के नागपुर–दुर्ग रेलखंड पर एसआईएल-4 स्तर की कमीशनिंग के लिए साइट परीक्षण और लोको ट्रायल जारी हैं। इसी क्रम में 23 जुलाई को कलमना–सालवा (25 किलोमीटर) रेलखंड पर ब्रेकिंग मोड ऑन के साथ एसआईएल-4 स्तर का कवच ट्रायल पूरी तरह सफल रहा। इस परीक्षण के दौरान सिग्नल रिस्पॉन्स, स्वचालित ब्रेकिंग, गति नियंत्रण और आपातकालीन एसओएस प्रणाली की कार्यक्षमता को परखा गया, जिसमें सभी परीक्षण सफल रहे। वहीं रायपुर मंडल के दुर्ग–मांढर रेलखंड पर भी परियोजना निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार तेजी से आगे बढ़ रही है।


'कवच' भारतीय रेल के अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) द्वारा विकसित विश्वस्तरीय एसआईएल-4 प्रमाणित स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली है। यह तकनीक लोको पायलट को वास्तविक समय में सिग्नल की स्थिति, अधिकतम अनुमत गति, लक्ष्य दूरी और मूवमेंट अथॉरिटी जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराती है। यदि चालक किसी कारणवश निर्धारित गति सीमा का पालन नहीं करता या खतरे वाले सिग्नल को पार करने की स्थिति बनती है, तो कवच बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वतः ब्रेक लगाकर ट्रेन को सुरक्षित रोक देता है। यही वजह है कि इसे भारतीय रेलवे की सबसे भरोसेमंद और भविष्य की सुरक्षा तकनीकों में शामिल किया जा रहा है।



इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल सिग्नल उल्लंघन ही नहीं रोकती, बल्कि आमने-सामने, पीछे से या साइड से होने वाली संभावित ट्रेन टक्कर को भी रोकने में सक्षम है। घने कोहरे या कम दृश्यता जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी यह सुरक्षित ट्रेन संचालन सुनिश्चित करती है। खतरे वाले सिग्नल को पार करने से पहले ट्रेन को स्वतः रोकना, निर्धारित गति सीमा से अधिक होने पर स्वचालित ब्रेक लगाना, स्थायी एवं अस्थायी गति प्रतिबंधों का पालन कराना, लेवल क्रॉसिंग के निकट स्वतः हॉर्न बजाना और किसी आपात स्थिति में स्टॉप ऑन साइट (एसओएस) संदेश प्रसारित कर आसपास की ट्रेनों को स्वतः नियंत्रित करना इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। इससे रेल परिचालन न केवल अधिक सुरक्षित होगा, बल्कि समयबद्धता और संचालन क्षमता में भी उल्लेखनीय सुधार आएगा.....


दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में चरणबद्ध तरीके से 'कवच' के विस्तार के साथ भारतीय रेलवे आत्मनिर्भर तकनीक के बल पर सुरक्षा का नया अध्याय लिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जब पूरा 2430 रूट किलोमीटर नेटवर्क इस अत्याधुनिक प्रणाली से जुड़ जाएगा, तब रेल दुर्घटनाओं की आशंका में भारी कमी आएगी और यात्रियों का भरोसा पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा। स्वदेशी तकनीक पर आधारित यह सुरक्षा कवच केवल रेलवे की उपलब्धि नहीं, बल्कि देश की तकनीकी क्षमता, आत्मनिर्भरता और सुरक्षित भविष्य की मजबूत पहचान बनकर उभर रहा है...........





Sunday, August 2, 2026

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना: किसानों को हर साल मिलती है आर्थिक सहायता, जानिए आवेदन की पूरी प्रक्रिया




 प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना: किसानों को हर साल मिलती है आर्थिक सहायता, जानिए आवेदन की पूरी प्रक्रिया


देश के करोड़ों किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता तीन समान किस्तों में सीधे उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। इस राशि का उपयोग किसान बीज, खाद, कृषि उपकरण और अन्य आवश्यक कृषि कार्यों में कर सकते हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य खेती की लागत का कुछ हिस्सा कम करने और छोटे एवं सीमांत किसानों को समय पर आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराना है।


इस योजना का लाभ लेने के लिए किसान के पास कृषि योग्य भूमि का रिकॉर्ड होना चाहिए तथा आधार कार्ड, बैंक खाता और मोबाइल नंबर जैसी आवश्यक जानकारी सही होना जरूरी है। आवेदन ऑनलाइन या संबंधित कृषि विभाग, कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) अथवा स्थानीय प्रशासन की सहायता से किया जा सकता है। आवेदन के बाद संबंधित विभाग दस्तावेजों का सत्यापन करता है और पात्र पाए जाने पर किसान का नाम लाभार्थी सूची में शामिल किया जाता है।


किसानों को समय-समय पर यह भी जांचते रहना चाहिए कि उनके आधार और बैंक खाते की जानकारी सही है या नहीं। यदि किसी जानकारी में त्रुटि होती है तो किस्त आने में परेशानी हो सकती है। सरकार समय-समय पर लाभार्थी सूची का सत्यापन भी करती है ताकि केवल पात्र किसानों को ही योजना का लाभ मिले।


विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी योजना का लाभ लेने से पहले उसकी आधिकारिक जानकारी अवश्य पढ़नी चाहिए। गलत जानकारी या फर्जी वेबसाइटों से बचना चाहिए और आवेदन केवल अधिकृत माध्यम से ही करना चाहिए। यदि किसी किसान को आवेदन या किस्त से संबंधित समस्या आती है तो वह संबंधित कृषि विभाग या अधिकृत सहायता केंद्र से संपर्क कर सकता है।


प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना किसानों को आर्थिक सहयोग देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। पात्र किसान समय पर आवेदन और दस्तावेजों का सत्यापन कराकर इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

Saturday, August 1, 2026

विरासत, संस्कृति और विकास की अनोखी गाथा


 बिलासपुर का इतिहास: विरासत, संस्कृति और विकास की अनोखी गाथा


छत्तीसगढ़ की न्यायधानी के रूप में पहचान बना चुका बिलासपुर केवल एक आधुनिक शहर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का जीवंत उदाहरण भी है। अरपा नदी के शांत तट पर बसा यह शहर आज न्यायपालिका, रेलवे, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार का प्रमुख केंद्र है। लेकिन बिलासपुर की पहचान केवल वर्तमान विकास तक सीमित नहीं है। इसका इतिहास हमें उन दिनों में ले जाता है, जब यह क्षेत्र दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक परंपराओं, कलचुरी शासकों की राजधानी और व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था।


आज देशभर में बिलासपुर को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के मुख्यालय के रूप में जाना जाता है। वहीं स्थानीय लोककथाओं में यह शहर वीरांगना बिलासा केंवटीन के साहस और संघर्ष की याद दिलाता है। यही कारण है कि इतिहास, संस्कृति और आधुनिक विकास का अनूठा संगम बिलासपुर

को छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में स्थान दिलाता है।


बिलासपुर नाम की उत्पत्ति


बिलासपुर के नाम को लेकर कई मान्यताएँ प्रचलित हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध मान्यता वीरांगना बिलासा केंवटीन से जुड़ी है। लोककथाओं के अनुसार बिलासा एक साहसी, निडर और समाजसेवी महिला थीं, जिन्होंने अपने साहस और नेतृत्व से लोगों का विश्वास जीता। उनके सम्मान में इस क्षेत्र का नाम "बिलासपुर" पड़ा।



आज भी छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, गीतों और कथाओं में बिलासा केंवटीन का विशेष स्थान है। राज्य सरकार भी उनके सम्मान में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बिलासपुर का इतिहास केवल इमारतों और राजाओं का नहीं, बल्कि जननायकों और लोकपरंपराओं का भी इतिहास है।


प्राचीन काल का बिलासपुर


प्राचीन समय में बिलासपुर का क्षेत्र दक्षिण कोसल का हिस्सा माना जाता था। यह क्षेत्र धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था। आसपास के रतनपुर, मल्हार और सिरपुर जैसे नगर उस समय शिक्षा, धर्म और कला के प्रमुख केंद्र थे।


विशेष रूप से मल्हार का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। यहाँ हुई पुरातात्विक खुदाइयों में कई प्राचीन मंदिर, मूर्तियाँ, सिक्के और शिलालेख मिले हैं, जो बताते हैं कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों से सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।


इतिहासकारों के अनुसार इस क्षेत्र में बौद्ध, जैन और सनातन धर्म की परंपराएँ साथ-साथ विकसित हुईं। यही विविधता आज भी बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान में दिखाई देती है।


कलचुरी शासन और रतनपुर का गौरव


बिलासपुर के इतिहास में कलचुरी वंश का विशेष महत्व है। लगभग 10वीं शताब्दी से रतनपुर कलचुरी राजाओं की राजधानी बना। उस समय पूरा क्षेत्र प्रशासन, व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था।


कलचुरी शासकों ने अनेक मंदिरों, तालाबों और धार्मिक स्थलों का निर्माण कराया। आज भी रतनपुर का महामाया मंदिर, प्राचीन किले के अवशेष और अन्य ऐतिहासिक धरोहरें उस गौरवशाली काल की याद दिलाती हैं।


उस समय कृषि और व्यापार दोनों तेजी से विकसित हुए। आसपास के गाँवों से अनाज, वन उत्पाद और हस्तशिल्प रतनपुर के बाजारों तक पहुँचते थे। इससे पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।


अरपा नदी का महत्व


बिलासपुर का विकास अरपा नदी के बिना अधूरा है। यह नदी केवल पानी का स्रोत नहीं रही, बल्कि शहर की संस्कृति, कृषि और व्यापार की आधारशिला भी बनी।


नदी के किनारे बसे गाँवों में खेती तेजी से विकसित हुई। लोगों को पीने का पानी, सिंचाई और आवागमन की सुविधा मिली। धीरे-धीरे नदी के आसपास बस्तियाँ विकसित हुईं, जो आगे चलकर आधुनिक बिलासपुर शहर का हिस्सा बन गईं।


आज भी अरपा नदी को बिलासपुर की जीवनरेखा कहा जाता है। हालांकि बढ़ते शहरीकरण के कारण इसके संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।


मराठा शासन का दौर


18वीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर मराठाओं का प्रभाव बढ़ा। मराठा शासन के दौरान राजस्व व्यवस्था में कई बदलाव किए गए। व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला और प्रशासनिक व्यवस्था को संगठित किया गया।


इसी काल में बिलासपुर का महत्व धीरे-धीरे बढ़ने लगा। आसपास के क्षेत्रों से व्यापारी यहाँ आने लगे और स्थानीय बाजारों का विस्तार हुआ। कृषि उत्पादों के साथ-साथ वन संपदा का व्यापार भी बढ़ा।


मराठा काल ने बिलासपुर को एक उभरते हुए व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचान दिलाई, जिसने आगे चलकर आधुनिक शहर बनने की नींव रखी।


अंग्रेजी शासन और आधुनिक प्रशासन की शुरुआत


1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद यह क्षेत्र अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। अंग्रेजी शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था को नया स्वरूप दिया गया। वर्ष 1861 में बिलासपुर को जिला बनाया गया और कुछ वर्षों बाद नगर पालिका की स्थापना हुई।


अंग्रेजों ने सड़क, राजस्व व्यवस्था और सरकारी कार्यालयों के विकास पर ध्यान दिया। इससे शहर में नई प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हुई और जनसंख्या भी बढ़ने लगी।


इसी दौर ने आधुनिक बिलासपुर की नींव रखी, जिसका प्रभाव आज भी शहर की संरचना और प्रशासन में दिखाई देता है।

अनुकंपा नियुक्ति वंशानुगत अधिकार नहीं...


अनुकंपा नियुक्ति वंशानुगत अधिकार नहीं, 16 साल बाद दायर याचिका खारिज; बिलासपुर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला



बिलासपुर – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति किसी कर्मचारी के परिवार का खानदानी या वंशानुगत अधिकार नहीं, बल्कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उत्पन्न तत्काल आर्थिक संकट से परिवार को राहत देने की एक विशेष व्यवस्था है। न्यायालय ने एक शासकीय कर्मचारी की बेटी द्वारा पिता के निधन के करीब 16 वर्ष बाद दायर अनुकंपा नियुक्ति की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इतने लंबे समय बाद इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य स्वतः समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति केवल



 सहानुभूति के आधार पर नहीं दी जा सकती और इसके लिए निर्धारित नियमों एवं समय-सीमा का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों से हटकर किसी को नियुक्ति देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर माना जा रहा है, जिससे स्पष्ट संदेश गया है कि इस व्यवस्था का लाभ केवल वास्तविक और तत्काल आर्थिक आवश्यकता की स्थिति में ही दिया जा सकता है, न कि वर्षों बाद इसे अधिकार के रूप में दावा किया जा सकता है।

जंतर-मंतर हिंसा: अचानक भड़का प्रदर्शन या पहले से रची गई साजिश? दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आ रहे चौंकाने वाले पहलू

 

दिल्ली –जंतर-मंतर हिंसा: अचानक भड़का प्रदर्शन या पहले से रची गई साजिश? दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आ रहे चौंकाने वाले पहलू


20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हुई हिंसा की गूंज अब भी थमी नहीं है। घटना को करीब दो सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी बरकरार है—क्या यह प्रदर्शन अचानक बेकाबू हुई भीड़ का परिणाम था या इसके पीछे पहले से रची गई कोई सुनियोजित साजिश थी? इसी सवाल का जवाब तलाशने में दिल्ली पुलिस और जांच एजेंसियां दिन-रात जुटी हुई हैं। पुलिस अब इस पूरे घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था भंग होने की घटना नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक साजिश के एंगल से भी जांच रही है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (एफआरएस), सोशल मीडिया गतिविधियां, डिजिटल फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जोड़कर घटना की एक-एक कड़ी खंगाली जा रही है। पुलिस का दावा है कि फेस रिकॉग्निशन सिस्टम के जरिए अब तक 2,873 लोगों की पहचान की गई है, जिनमें 989 लोगों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड होने की बात कही गई है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच जारी है। घटना वाले दिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के बाद भीड़ ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, जबकि उस समय मानसून सत्र चल रहा था और क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू थी। सुरक्षा के लिए कई स्तर की बैरिकेडिंग की गई थी, लेकिन पुलिस के अनुसार कुछ लोगों ने बैरिकेड हटाने का प्रयास किया, जिसके बाद तनाव तेजी से हिंसा में बदल



 गया। पुलिस का आरोप है कि उस दौरान पथराव हुआ, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, बैरिकेड तोड़े गए और वाहनों में तोड़फोड़ की गई। हालात काबू से बाहर होने पर पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और रैपिड एक्शन फोर्स की मदद से भीड़ को तितर-बितर किया। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक कुछ प्रदर्शनकारी संसद भवन के प्रवेश क्षेत्र के बेहद करीब तक पहुंच गए थे, जिसके बाद संसद परिसर में तैनात सीआईएसएफ जवानों को हाई अलर्ट पर रखा गया। पुलिस के अनुसार 21 से 25 जुलाई के बीच भी राजधानी के अलग-अलग इलाकों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए, जिनमें कई वरिष्ठ अधिकारी समेत लगभग 250 पुलिसकर्मी घायल हुए। सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचा, जिसमें 100 से अधिक बैरिकेड, सैकड़ों बॉडी प्रोटेक्टर, हेलमेट, दंगा-रोधी शील्ड, लाउड हेलर और कई सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त होने की बात कही गई है। पूरे मामले में 20 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं और दंगा, सरकारी संपत्ति को नुकसान, हत्या के प्रयास, पुलिस पर हमला, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने के प्रयास तथा आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराओं के तहत जांच आगे बढ़ रही है। पुलिस उन लोगों की भी पहचान करने की कोशिश कर रही है जो मास्क और सुरक्षात्मक उपकरण पहनकर आए थे, जबकि करीब 400 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनलों, मोबाइल चैट तथा डिजिटल डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है। जांच एजेंसियां कुछ राजनीतिक संगठनों और अन्य समूहों की संभावित भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं, लेकिन अब तक किसी संगठन या व्यक्ति की भूमिका पर कोई आधिकारिक निष्कर्ष घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं और उनका जवाब जांच पूरी होने तथा अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएगा। तब तक यह मामला केवल एक हिंसक प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश की राजधानी की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और संभावित साजिश की परतों को खोलने वाली सबसे चर्चित जांचों में से एक बना हुआ है।

Friday, July 31, 2026

दो साल बाद जेल में बंद विचाराधीन कैदी की मौत मामले में हत्या का केस दर्ज, अज्ञात आरोपी के खिलाफ FIR




दो साल बाद जेल में बंद विचाराधीन कैदी की मौत मामले में हत्या का केस दर्ज, अज्ञात आरोपी के खिलाफ FIR

श्रवण सूर्यवंशी की संदिग्ध मौत की जांच ने लिया नया मोड़, सिर पर गंभीर चोट के बाद पुलिस ने शुरू की हत्या की विवेचना

बिलासपुर केंद्रीय जेल में विचाराधीन बंदी श्रवण सूर्यवंशी उर्फ श्रवण ताम्रे की मौत के मामले में करीब दो वर्ष बाद बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। न्यायिक जांच रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश के आधार पर सिविल लाइन थाना पुलिस ने अज्ञात आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की लागू समकक्ष धारा के अनुरूप हत्या का मामला दर्ज कर विस्तृत विवेचना शुरू कर दी है। इस कार्रवाई के साथ ही लंबे समय से चर्चा में रहे कस्टोडियल डेथ मामले की जांच अब नए चरण में पहुंच गई है।

मिली जानकारी के अनुसार ग्राम मोहरा, थाना सीपत निवासी 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी अधिनियम के एक मामले में गिरफ्तार कर जनवरी 2024 में बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा गया था। 21 जनवरी को जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई थी। प्रारंभिक तौर पर मर्ग कायम कर जांच शुरू की गई, लेकिन न्यायिक जांच के दौरान पोस्टमार्टम, एफएसएल, हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट, वीडियोग्राफी, पंचनामा और गवाहों के बयान सहित सभी साक्ष्यों की समीक्षा में सामने आया कि मृत्यु सिर में लगी गंभीर चोट और उससे उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। चिकित्सकीय रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि चोट किसी कठोर एवं भोथरी वस्तु से लगना संभव है, जबकि रासायनिक परीक्षण में किसी प्रकार का विष नहीं मिला।


न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की जांच रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपे जाने के बाद मामले का परीक्षण किया गया। मृतक के परिजनों ने जांच के दौरान किसी व्यक्ति पर प्रत्यक्ष संदेह तो व्यक्त नहीं किया, लेकिन गिरफ्तारी के बाद जेल में हुई मौत को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उपलब्ध साक्ष्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर 30 जुलाई 2026 को अज्ञात आरोपी के विरुद्ध हत्या का अपराध दर्ज किया गया। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि श्रवण के सिर पर घातक चोट किन परिस्थितियों में लगी, इसके पीछे कौन जिम्मेदार था और क्या यह जेल के भीतर हुई आपराधिक घटना थी। मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्यों के सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

बिलासपुर सेंट्रल जेल में कैदी की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, DGP और गृह सचिव 4 अगस्त को होंगे तलब

 



बिलासपुर सेंट्रल जेल में कैदी की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, DGP और गृह सचिव 4 अगस्त को होंगे तलब

एक लाख मुआवजे को सुप्रीम कोर्ट ने माना नाकाफी, कस्टोडियल डेथ में FIR और आपराधिक जांच पर मांगा जवाब

बिलासपुर स्थित केंद्रीय जेल में विचाराधीन कैदी श्रवण सूर्यवंशी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। मृतक के परिजनों की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को 4 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के निर्देश पर परिजनों को दिए गए एक लाख रुपये के मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि हिरासत में हुई मौत के इस मामले में अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई और आपराधिक जांच की दिशा में क्या ठोस कार्रवाई हुई है। उल्लेखनीय है कि 18 जनवरी 2024 को सीपत थाना पुलिस ने आबकारी अधिनियम के तहत 6 लीटर कच्ची महुआ शराब बरामदगी के आरोप में श्रवण सूर्यवंशी को गिरफ्तार कर बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा था। 21 जनवरी को जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी को उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। बाद में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच में यह सामने आया कि उसकी मौत सिर में लगी गंभीर चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। इसके बाद परिजनों ने दोषी पुलिस एवं जेल अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के हलफनामे पर असंतोष जताते हुए कहा कि उसमें न तो एफआईआर दर्ज न होने का संतोषजनक कारण बताया गया है और न ही आपराधिक जांच की प्रगति का स्पष्ट विवरण दिया गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य के शीर्ष अधिकारियों को अदालत के समक्ष जवाब देना होगा, जिससे कस्टोडियल डेथ के इस बहुचर्चित प्रकरण में आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।

Thursday, July 30, 2026

जिस्म में लोहे सा दम या पैकेटबंद मौत का जहर

 शीर्षक:–जिस्म में लोहे सा दम या पैकेटबंद मौत का जहर


जहाँ आज हमारी आधुनिक और रफ्तार भरी जिंदगी ने हमें सुपरमार्केट की चमकीली पन्नी और फ्रिज के ठंडे जहर का गुलाम बना दिया है, वहीं अगर हम अपने पूर्वजों की उस सोंधी और प्राणवान थाली पर एक सरसरी नजर डालें, तो जमीन आसमान का यह ऐसा खौफनाक और चीरफाड़ करने वाला फर्क साफ दिखाई देता है कि जिसे पढ़कर आज की इस एस्प्रिन और इंसुलिन पर पलने वाली पीढ़ी की रूह काँप जाएगी और रगों में खौलता हुआ लावा दौड़ पड़ेगा। जरा सोचिए, उस दौर की मिसाल जब हमारे बुजुर्ग सुबह-सुबह कोहरे की चादर के बीच उठकर खेतों की उपजाऊ और रसायन-मुक्त मिट्टी से उपजे बाजरे, ज्वार और मक्के की उस सोंधी रोटी को अपने हाथों से मथकर निकाले गए शुद्ध और ताज़े मक्खन व गाढ़े देसी घी के साथ बड़े चाव से खाते थे, जो उनके जिस्म में लोहे जैसी फौलादी ताकत और हड्डियों में पहाड़ जैसा दम भर देता था, जबकि आज का यह कॉर्पोरेट युग में जीने वाला इंसान अपनी 24वीं-25वीं मंजिल के कांच वाले कमरों में बैठकर फैक्ट्रियों में जहरीले हेक्सेन केमिकल और हाई-टेंपरेचर की भट्टियों से पकाए गए उस तथाकथित 'रिफाइंड ऑयल' और मैदे से बनी जानलेवा ब्रेड-नूडल्स को गटक रहा है, जिसने महज तीस साल की उम्र में ही युवाओं को फैटी लिवर, हार्ट अटैक और कम उम्र की डायबिटीज जैसी लाइलाज बीमारियों का लाचार गुलाम बना डाला है। जरा कल्पना कीजिए उस प्राचीन संस्कृति की जहाँ ताँबे के बर्तन और मिट्टी के उस मटके का अमृत तुल्य शीतल जल पिया जाता था जो पेट की हर एक आग को शांत कर आंतरिक शुद्धि देता था, उसके मुकाबले आज का युवा अपनी प्यास बुझाने के लिए उन रंग-बिरंगी बोतलों में भरी कोल्ड ड्रिंक्स और सोडे को गटकता है जिनमें सात-सात चम्मच घुली हुई चीनी सीधे उसके अग्नाशय और हड्डियों को अंदर से दीमक की तरह चाट रही है, और तो और, जब हमारे पुरखों का खान-पान एक पवित्र संस्कार हुआ करता था जहाँ वे परिवार के साथ जमीन पर पालथी मारकर बैठते थे, हर एक कौर को इत्मीनान से 32 बार चबाकर अपनी लार के साथ अमृत बनाकर भीतर उतारते थे ताकि पाचन तंत्र हमेशा वज्र जैसा मजबूत रहे, तो इसके ठीक उलट आज का यह आधुनिक मानव डाइनिंग टेबल या ऑफिस की कुर्सियों पर एक हाथ में मोबाइल की नीली स्क्रीन पर अंतहीन रील्स को स्वाइप करते हुए और दूसरे हाथ में प्रिजर्वेटिव्स से सड़े हुए पैकेटबंद जंक फूड को बिना चबाए ऐसे गटक जाता है जैसे किसी मवेशी को चारा ठूसा जा रहा हो, जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास भले ही स्वाद के नाम पर दुनिया भर के रेस्टोरेंट, महंगे पिज़्ज़ा-बर्गर और लाखों डिग्रियाँ मौजूद हों, लेकिन वह नैसर्गिक ऊर्जा, वह बुलंद हौसला और वह मानसिक सुकून हमेशा के लिए गायब हो चुका है जो कभी हमारे उन बुजुर्गों की थाली की शान हुआ करता था जो बिना किसी डॉक्टर, बिना किसी मेडिक्लेम और बिना किसी अस्पताल की देहरी लाँघे हँसते-खेलते सौ साल की फौलादी जिंदगी जी जाते थे, इसलिए अब भीवक्त है कि इस अंधी और विनाशकारी डिजिटल दौड़ से बाहर निकलकर अपनी जड़ों की उस सोंधी महक को पहचानिए, क्योंकि अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कोसेगी कि हमने स्वाद के चक्कर में अपनी सेहत, अपनी संस्कृति और अपनी नस्ल दोनों को बाजार के हाथों नीलाम कर दिया।


रील्स की चमक और अपनों की खामोश चीख: क्या हमने फोन को अपना सब कुछ मान लिया है?

शीर्षक: रील्स की चमक और अपनों की खामोश चीख.....क्या हमने फोन को अपना सब कुछ मान लिया है?



शाम की हल्की रोशनी जब ड्राइंग रूम की खिड़की से अंदर आती है, तो अमूमन वहाँ चाय की कपों की खनक, हँसी-मजाक और दिनभर के हाल-चाल गूँजा करते थे। लेकिन आज उस कमरे में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा पसरा रहता है। सन्नाटा इस बात का नहीं कि वहाँ कोई नहीं है—वहाँ पूरा परिवार मौजूद है। माँ एक कोने में बैठी हैं, पिता जी दूसरे कोने में, और बेटा-बेटी अपनी-अपनी दुनिया में गुम हैं। अजीब बात यह है कि कोई किसी से बात नहीं कर रहा, सबके हाथों में स्क्रीन जल रही है, और मोबाइल की नीली रोशनी उनके चेहरों पर एक अजीब सा वीरानपन और कृत्रिम चमक छोड़ रही है।


हम एक ऐसी डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ अपनों से चंद कदम की दूरी पर बैठकर हम उन्हें रील्स भेजते हैं। सोचकर देखिए, यह आधुनिकता का कौन सा भयानक मुकाम है, जहाँ अपनों के जज़्बात, उनकी मुस्कान और उनके आंसुओं से ज्यादा कीमती हमारे लिए कुछ सेकंड के वीडियो पर मिलने वाले 'लाइक्स' और 'व्यूज' हो गए हैं।



(स्क्रीन की चकाचौंध में खोता अपनापन)

याद कीजिए वो दौर जब घरों में संवाद ही सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करता था। लोग एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करते थे, चेहरे के भाव पढ़कर समझ जाते थे कि अंदर क्या तूफान चल रहा है। आज? आज हम स्क्रीन के उस पार बैठे किसी अनजान अजनबी के रोने पर तो दिल (❤️) वाला इमोजी भेज देते हैं, लेकिन अपने ही घर में सुबक रही माँ की आँखों के कोने में जमी नमी हमें नजर नहीं आती।



कल शाम की ही तो बात है। एक बुजुर्ग पिता ने अपने युवा बेटे से कहा, "ेटा, थोड़ी देर फोन रख दे, ज़रा साथ बैठकर बात कर।" बेटे की उंगलियाँ स्क्रीन पर तेज़ी से चल रही थीं, बिना नजर उठाए उसने एक रील का लिंक पिता के व्हाट्सएप पर भेज दिया और बेरुखी से बोला, "पापा, यह वाला देखो, बहुत फनी है, बाद में बात करते हैं।"

उस बूढ़े बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी? उस पिता ने, जिसने अपनी पूरी जवानी उस बेटे की उंगली थामकर उसे चलना सिखाने में बिता दी, आज बुढ़ापे में दो मिनट की तवज्जो के लिए एक वर्चुअल लिंक का मोहताज हो गया। क्या इसी दिन के लिए उसने अपने अरमानों का गला घोंटा था?

(फॉलोअर्स' की भीड़ और अपनों का अकेलापन)

आज हमारी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। इंस्टाग्राम और फेसबुक के 'फॉलुअर्स' हमारी हकीकत बन चुके हैं। हम इस भ्रम में जी रहे हैं कि जितने ज्यादा लोग हमें स्क्रीन पर देख रहे हैं, हम उतने ही लोकप्रिय और खुश हैं। लेकिन यह डिजिटल लोकप्रियता एक छलावा है, एक ऐसा नशा है जो धीरे-धीरे हमें अपनों से काट रहा है।

हम वर्चुअल दुनिया में दूसरों को हँसाने और प्रभावित करने के चक्कर में अपने घर के अंदर के लोगों को रुला रहे हैं। एक पत्नी दिनभर रील्स बनाने की जुगत में लगी रहती है—कौन सा ट्रेंडिंग गाना चल रहा है, किस पर वीडियो बनानी है। पति अपने ऑफिस के तनाव से चूर होकर घर लौटता है, तो उसे सुकून का एक कंधा मिलने के बजाय कैमरे के सामने पोज देने को कहा जाता है। रिश्तों की ऊष्मा अब लाइक और कमेंट के काउंटर पर आकर दम तोड़ रही है।

( जब तक अहसास होगा, बहुत देर हो चुकी होगी  )

तकनीक दुश्मन नहीं है, दुश्मन हमारा अतिरेक है। मोबाइल ने दुनिया को छोटा किया है, लेकिन हमारे घरों के दिलों को बहुत दूर कर दिया है।

हम यह भूल रहे हैं कि जिंदगी कोई रील्स की फीड नहीं है, जिसे स्वाइप करके अगला पन्ना पलटा जा सके। जो लोग आज हमारे पास हैं, जो माँ-बाप हमारे लौटने का इंतजार करते हैं, जो जीवनसाथी हमारी एक मीठी मुस्कान को तरसता है—वे हमेशा के लिए यहाँ नहीं रहने वाले।

एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे पास लाखों फॉलोअर्स होंगे, बैंक खाते में पैसे होंगे, मोबाइल की गैलरी हजारों वीडियो से भरी होगी, लेकिन जब हम मुड़कर देखेंगे तो घर का वह कमरा खाली मिलेगा। तब कोई हमें रील्स भेजने वाला नहीं होगा, कोई हमारी पोस्ट पर लाइक करने वाला नहीं होगा। बस पछतावे के सिवाय हाथ कुछ नहीं लगेगा।


आज इस लेख को पढ़ते-पढ़ते खुद से एक सवाल पूछिए—क्या वाकई हमने अपने अपونों को उस स्क्रीन के हवाले कर दिया है, जिसकी कोई रूह नहीं होती?

वक्त अभी भी पूरी तरह से नहीं फिसला है। आज ही, बल्कि इसी वक्त, अपने हाथ से उस फोन को नीचे रखिए। पास बैठे अपने पिता का हाथ थामिए, अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर पूछिए कि वे कैसे हैं, अपने बच्चों के साथ बिना फोन के दो पल खुलकर हँसिए


क्योंकि अंत में, न कोई रील साथ जाएगी, न कोई लाइक मायने रखेगा—सिर्फ और सिर्फ अपनों का साथ और उनके चेहरों की सच्ची मुस्कान ही हमारी असली पूंजी है। फोन को अपना मालिक मत बनने दीजिए, इसे सिर्फ एक उपकरण ही रहने दीजिए। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, अपनी इस खूबसूरत जिंदगी को रील्स के फ्रेम से बाहर निकालिए और अपनों को गले लगा लीजिए।


क्यों बढ़ रहा है युवाओं में आत्महत्या का अंधकार और कैसे बचाएं अपनी आने वाली पीढ़ी को?

 आज का युवा.....


उम्मीदों के बोझ और तन्हाई के साए में घुटता बचपन: क्यों बढ़ रहा है युवाओं में आत्महत्या का अंधकार और कैसे बचाएं अपनी आने वाली पीढ़ी को?


आज का दौर डिजिटल क्रांति, असीम संभावनाओं और रफ्तार का है, लेकिन इस चमक-धमक और बाहरी दिखावे के पीछे एक बेहद खौफनाक और गहरा अंधेरा भी पल रहा है—वह है हमारी युवा पीढ़ी में तेजी से बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति। आज का युवा, जो देश का भविष्य और समाज की रीढ़ है, वो डिप्रेशन, अकेलेपन, और क्षणिक असफलताओं के आगे इस कदर घुटने टेक रहा है कि वह जीवन के इस खूबसूरत सफर को बीच में ही छोड़कर हमेशा के लिए विदा हो रहा है। परीक्षा के प्राप्तांकों का दबाव, करियर की अंतहीन दौड़, एकतरफा या असफल प्रेम संबंध, सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की अंधी होड़ और अपनों के बीच बढ़ती संवादहीनता—ये सब आज किसी हँसते-खेलते युवा के लिए इतना बड़ा बोझ बन जाते हैं कि उसे मौत ही एकमात्र रास्ता नजर आने लगती है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि हमारी पूरी पारिवारिक, सामाजिक और शिक्षा व्यवस्था की एक बहुत बड़ी असफलता है, जिस पर आज गंभीर मंथन और सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

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अगर इस भयावह समस्या की जड़ों में उतरकर देखा जाए, तो इसके पीछे कई ऐसे गहरे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हैं, जिनका जिक्र करना और समाधान ढूंढना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।

सबसे पहले बात करते हैं आज की इस नई पीढ़ी (Gen Z) के उस मानसिक तनाव की, जो वे हर पल अपने भीतर महसूस कर रहे हैं। आज का युवा एक ऐसे दौर में जी रहा है जहाँ 'तुलना की संस्कृति' चरम पर है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हर कोई अपनी जिंदगी का केवल एक खूबसूरत और झूठा हिस्सा ही दिखाता है—हँसते हुए चेहरे, महंगी गाड़ियाँ, शानदार पार्टियाँ और विदेश यात्राएं। एक सामान्य और संघर्षरत जीवन जी रहा युवा जब अपनी साधारण असलियत की तुलना दूसरों के इन 'फिल्टर्ड' और बनावटी जीवन से करता है, तो उसके मन में हीनभावना घर कर जाती है। उसे लगने लगता है कि वह अपने जीवन में असफल हो गया है, जबकि उसे यह अहसास ही नहीं होता कि सोशल मीडिया का वह संसार पूरी तरह छलावा है। इसके अलावा, आज के दौर में 'तात्कालिक संतुष्टि' (Instant Gratification) की आदत बहुत बढ़ गई है। युवाओं को हर चीज तुरंत चाहिए—पल भर में सफलता, रातों-रात दौलत और हर जगह लोकप्रियता। जब जीवन में धीमापन, संघर्ष या असफलता का सामना करना पड़ता है, तो उनका यह नाजुक मन उस दबाव को झेल नहीं पाता और बिखर जाता है।

इस पूरे संकट में एक और बड़ा और गंभीर पहलू जुड़ा हुआ है, और वह है घर-परिवार के भीतर का माहौल और माता-पिता की उम्मीदों का पहाड़। आज अनजाने में ही सही, लेकिन परिजन अपने बच्चों को सफलता की एक ऐसी मशीन बना देना चाहते हैं जहाँ भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। बचपन से ही बच्चे के कान में यह बात भर दी जाती है कि उसे डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस ही बनना है, और अगर उसके नंबर कम आए, तो उसका और उसके परिवार का भविष्य बर्बाद हो गया। शर्मा जी या वर्मा जी के बेटे से अपने बच्चे की हर रोज होने वाली तुलना बच्चे के अंदर ही अंदर घुटने पर मजबूर कर देती है। कई बार जब बच्चा परीक्षाओं में फेल हो जाता है या मनचाहा करियर नहीं चुन पाता, तो उसे लगता है कि अब वह अपने माता-पिता की नजरों में कभी नजर मिलाने लायक नहीं बचा। परिजनों का यह अति-अपेक्षात्मक रवैया और बच्चे के फेल होने पर उसे ताने देना या डांटना, उसे मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ देता है। घर जो बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह होना चाहिए था, जब वही जगह जजमेंट और दबाव का अड्डा बन जाती है, तो युवा बाहर की दुनिया में रास्ता तलाशने लगता है जहाँ अक्सर उसे गलत संगत और गलत रास्ते ही मिलते हैं।

पारिवारिक पहलुओं के साथ-साथ आज की शिक्षा प्रणाली और आर्थिक अनिश्चितता भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रही है। आज स्कूलों और कॉलेजों में केवलता किताबी रट्टा मारने और बड़ी डिग्रियां हासिल करने की अंधी दौड़ है। पाठ्यक्रम में जीवन के तनाव से लड़ना, मानसिक संतुलन बनाए रखना या असफलता के बाद दोबारा कैसे उठना है, इन बातों का कोई जिक्र नहीं होता। युवा जब अपनी पढ़ाई पूरी करके बाहर निकलता है, तो बेरोजगारी का भीषण संकट उसका स्वागत करता है। सालों की मेहनत के बाद भी जब नौकरी नहीं मिलती, परिवार और समाज ताने कसने लगते हैं, और आर्थिक तंगी घेर लेती है, तो युवा खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करने लगता है। उसे लगने लगता है कि उसके परिवार का उस पर जो पैसा खर्च हुआ है, वह उसका कर्ज नहीं चुका पा रहा है, और यही ग्लानि और निराशा उसे उस खौफनाक कदम की तरफ धकेल देती है।


इन सब कारणों के बीच एक और अनदेखा पहलू है—अकेलापन और संवादहीनता (Communication Gap)। आज के आधुनिक घरों में माँ, बाप और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अलग-अलग मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। किसी के पास किसी के लिए वक्त नहीं है। बच्चे के मन में क्या चल रहा है, वह अंदर से किस पीड़ा से गुजर रहा है, उसके दोस्त कौन हैं, या वह किसी बात से डरा हुआ है या नहीं—इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। जब युवा अपने दिल की बात अपने माता-पिता या भाई-बहन से साझा नहीं कर पाता, तो वह उस घुटन को अपने भीतर समेटे रहता है, जो धीरे-धीरे एक गंभीर डिप्रेशन या मानसिक बीमारी का रूप ले लेती है।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब हमें समाज के हर एक कोने से आगे आना होगा और सामूहिक प्रयास करने होंगे। सबसे पहले माता-पिता को अपनी सोच में क्रांतिकारी बदलाव लाना होगा। आपको अपने बच्चों को केवल नंबरों या किसी डिग्री के तराजू में नहीं तौलना है। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि वे अंकसूची से बहुत ऊपर हैं और आपकी जिंदगी के लिए अनमोल हैं। बच्चों को यह सिखाना बेहद जरूरी है कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने और संभलने का एक मौका है। अगर आपका बच्चा किसी परीक्षा में असफल हो जाता है या जीवन में पीछे रह जाता है, तो उस वक्त उसे डांटने या कोसने की बजाय उसे गले लगाने और उसका हाथ थामने की जरूरत होती है। घर का माहौल ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चा अपनी हर गलती, हर डर और हर असफलता को बिना किसी डर के खुलकर अपने माता-पिता के सामने रख सके।

इसके साथ ही, समाज और समुदाय के स्तर पर 'मानसिक स्वास्थ्य' (Mental Health) को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना होगा। हमारे समाज में आज भी अगर कोई व्यक्ति डिप्रेशन या एंग्जाइटी से जूझ रहा है और मनोचिकित्सक (Therapist) के पास जाता है, तो लोग उसे 'पागल' कहकर उसका मजाक उड़ाते हैं। इस सामाजिक कलंक को जड़ से उखाड़ना होगा। जैसे शरीर के किसी अंग में तकलीफ होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मन के बीमार होने पर काउंसलर की मदद लेना उतना ही सामान्य और जरूरी होना चाहिए।

युवा पीढ़ी को खुद भी यह समझना होगा कि जीवन बहुत बड़ा और खूबसूरत है, और वर्तमान की कोई भी मुसीबत या असफलता इतनी बड़ी नहीं है कि उसके लिए अपनी अनमोल सांसों को त्याग दिया जाए। आज अगर आप असफल हुए हैं, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कल आप सफल नहीं हो सकते। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, बस जरूरत है तो धैर्य रखने की और अपनों का साथ थामने की।

यह लड़ाई सिर्फ किसी एक परिवार या सरकार की नहीं है, बल्कि हम सबको मिलकर—समाज, परिवार, दोस्तों और हर एक जिम्मेदार नागरिक को—एकजुट होकर इस सोच के खिलाफ लड़ना होगा। हमें अपने आसपास के हर युवा पर नजर रखनी होगी, उसकी खामोशी को पढ़ना होगा और उसे यह अहसास कराना होगा कि वह इस दुनिया में अकेला नहीं है। आइए, आज यह पक्का संकल्प लें कि हम किसी भी युवा को निराशा के इस अंधेरे में अकेला नहीं डूबने देंगे, उसका हाथ थामेंगे, उसे सुनेंगे, और उसे बताएंगे कि उसकी एक-एक साँस इस पूरे समाज और देश के लिए सबसे ज्यादा कीमती है.......



Monday, July 27, 2026

नीट पेपर लीक और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के विरोध में बिलासपुर में निकली जन आक्रोश रैली

 नीट पेपर लीक और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के विरोध में बिलासपुर में निकली जन आक्रोश रैली

बिलासपुर –25 जुलाई 2026 को बिलासपुर में नीट पेपर लीक मामले के विरोध और दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज के प्रतिरोध में सैकड़ों युवाओं, विद्यार्थियों एवं जागरूक नागरिकों द्वारा स्थानीय गांधी चौक से सिम्स चौक तक एक विशाल और अनुशासित जन आक्रोश रैली निकाली गई, जिसका आरंभ गांधी जी की प्रतिमा पर मालयार्पण के साथ हुआ तथा मार्ग में जूना बिलासपुर, सिटी कोतवाली,


 गोलबाजार और सदर बाजार से गुजरते हुए सिम्स चौक पर सामूहिक राष्ट्रगान के साथ इसका समापन किया गया। इस रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सरकार की परीक्षा नीतियों के खिलाफ नारे लगाने के साथ एनटीए (NTA) को भंग करने,





 सोनम वांगचुक के संघर्ष का समर्थन करने तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देश भर के छात्र आंदोलनों की बड़ी जीत करार दिया। इस विरोध प्रदर्शन में जेन जी के छात्र-छात्राओं, युवाओं के साथ-साथ शहर के अनेक बुद्धिजीवियों और नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिनमें प्रियंका शुक्ला अधिवक्ता, कुणाल रामटेके, नन्द कश्यप, प्रथमेश मिश्रा, प्रशांत ठाकुर, शशांक देवांगन, सूर्या शर्मा, अकरम, राजिक अली, सूरज साहू, लोकेश उइके, पूजा उइके, रजनीश श्रीवास्तव, आदर्श, प्रज्ञा मेश्राम, विवेक यादव, परदेसी रात्रे, छोटू ध्रुव, जैरी हेनरी, खालिद खान, सज्जू खान, जसबीर सिंह चावला, असीम तिवारी और कमलेश लौहरात्रे समेत ढेरों लोग उपस्थित रहे, जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था में सुधार होने तक समय-समय पर आंदोलन जारी रखने की सहमति जताते हुए अगले दिन रायपुर जाने की भी जानकारी दी।


Wednesday, July 22, 2026

बिलासपुर के NEET सफल छात्रों ने मनाया जश्न, री-नीट की चुनौतियों से पार पाकर दी प्रेरणादायक सीख

 NEET SUCCESS


बिलासपुर : NEET परीक्षा में शानदार सफलता हासिल करने वाले बिलासपुर के छात्र-छात्राओं ने अपनी कामयाबी का जश्न मनाया। इस दौरान सफल विद्यार्थियों ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता, शिक्षकों और लगातार मिली प्रेरणा को दिया। छात्रों ने री-नीट जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का जिक्र करते





 हुए कहा कि कठिन समय में परिवार और शिक्षकों का साथ ही उन्हें दोबारा खड़े होने की ताकत देता है। साथ ही उन्होंने छात्रों से किसी भी परिस्थिति में गलत कदम न उठाने और खुलकर अपने परिजनों व शिक्षकों से बात करने की अपील भी की। बिलासपुर में NEET परीक्षा में सफल हुए छात्र-छात्राओं का सम्मान और जश्न का माहौल देखने को मिला। 




सफल विद्यार्थियों ने कहा कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि उनके माता-पिता, शिक्षकों और हर उस व्यक्ति की है जिसने मुश्किल समय में उनका साथ दिया। छात्रों ने बताया कि री-नीट की घोषणा के बाद वे भी निराश हुए थे, लेकिन परिवार और शिक्षकों के हौसले ने उन्हें फिर से मेहनत करने के



 लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि सफलता का सबसे बड़ा मंत्र लगातार अभ्यास, टेस्ट सीरीज और प्रश्नपत्रों का विश्लेषण है। एक अन्य सफल छात्र उत्कर्ष राठौर ने बताया कि री-नीट ने उन्हें अपनी पिछली रैंक सुधारने का एक नया अवसर दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों का योगदान शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वहीं अन्य विद्यार्थियों ने भी अनअकैडमी बिलासपुर सेंटर के शिक्षकों का आभार जताते हुए कहा कि हर परिस्थिति में उन्हें केवल अपना सर्वश्रेष्ठ देने की सीख मिली। छात्रों ने उन अभ्यर्थियों से भी अपील की जो असफलता से निराश हैं कि आत्महत्या कभी समाधान नहीं है, बल्कि अपने परिवार और शिक्षकों से बात कर आगे बढ़ना ही सही रास्ता है। NEET में सफलता हासिल करने वाले इन छात्रों की कहानी बताती है कि मेहनत, सही मार्गदर्शन और परिवार का भरोसा किसी भी मुश्किल को सफलता में बदल सकता है। छात्रों की यह उपलब्धि अब दूसरे अभ्यर्थियों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

ऐतिहासिक नगरी मल्हार में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की नई शाखा का हुआ शुभारंभ, क्षेत्रीय विकास को मिलेगी गति

ऐतिहासिक नगरी मल्हार में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की नई शाखा का हुआ शुभारंभ, क्षेत्रीय विकास को मिलेगी गति

बिलासपुर :–बिलासपुर जिले के प्रमुख ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल मल्हार में आज 22 जुलाई 2026 को छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की 629वीं और जिले की 37वीं नवीन शाखा का भव्य शुभारंभ किया गया। बैंक के माननीय अध्यक्ष  विनोद कुमार अरोरा के कर-कमलों द्वारा उद्घाटित इस समारोह में क्षेत्रीय प्रबंधक सुरेश कुमार सिंह राजपूत, कॉर्पोरेट ऑफिस से श्रीनिवासन , वरिष्ठ प्रबंधक परिचालन दिनेश कुमार चौहान, सामान्य बैंकिंग प्रभारी राहुल कुमार शर्मा, शाखा प्रबंधक


 धीरज कुमार, कार्यालय सहायक यश गुप्ता सहित स्थानीय गणमान्य नागरिक शेष नारायण गुप्ता, अवधेश कुमार, नरेन्द्र








 कुमार (संचालक, लक्ष्मी वस्त्रालय), सत्य राय और बड़ी संख्या में ग्रामीण जन उपस्थित रहे। उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए अध्यक्ष महोदय ने बैंक के विभिन्न उत्पादों की जानकारी दी और विश्वास जताया कि यह शाखा क्षेत्र के आर्थिक विकास में एक मील का पत्थर साबित होगी, साथ ही उन्होंने उपस्थितजनों को जागरूक करते हुए साइबर सुरक्षा से बचने के महत्वपूर्ण उपाय भी साझा किए........


Monday, July 13, 2026

सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग का कारनामा– विभागीय निर्देशों की अनदेखी कर शिक्षकों को बनाया जा रहा अधीक्षक

 सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग का कारनामा– विभागीय निर्देशों की अनदेखी कर शिक्षकों को बनाया जा रहा अधीक्षक


​सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग बिलासपुर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जहाँ लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के स्पष्ट आदेशों के बावजूद शिक्षकों को उनके मूल शिक्षण कार्य से मुक्त नहीं किया गया है। विभाग की ओर से प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अवहेलना करते हुए बड़ी संख्या में शिक्षकों को छात्रावासों के प्रभारी अधीक्षक का अतिरिक्त प्रभार थमाया जा रहा है। जिले में कुल 84 छात्रावासों के सापेक्ष 60 से अधिक नियमित अधीक्षक कार्यरत हैं, इसके बावजूद बिल्हा, तखतपुर, चपोरा, कुरवार, शिवतराई, जारहाभाटा, बोड़सरा और मस्तूरी जैसे विकासखंडों में नियमित अधीक्षकों की मौजूदगी के बावजूद शिक्षकों को प्रभारी अधीक्षक के रूप में तैनात रखा गया है।



 बिल्हा और तखतपुर जैसे क्षेत्रों में तो एक ही शिक्षक को दो-दो छात्रावासों का प्रभार दिया गया है, जबकि वहाँ पहले से ही नियमित अधीक्षक मौजूद हैं। जारहाभाटा कैंपस में तीन नियमित अधीक्षकों की उपलब्धता के बाद भी प्रभारी व्यवस्था बनाए रखना विभाग की मनमानी और प्रशासनिक अव्यवस्था को उजागर करता है। सहायक आयुक्त कार्यालय द्वारा नियमित अधीक्षकों को दरकिनार कर शिक्षकों को अतिरिक्त प्रभार देने का यह विकल्प विभागीय कार्य संस्कृति और शिक्षकों के मूल कर्तव्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है.......

Sunday, July 12, 2026

शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर बरसे राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी, रविंद्र सिंह के साथ की संगठनात्मक चर्चा

बिलासपुर आगमन पर राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का जिला शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र सिंह ने सौजन्य भेंट कर गर्मजोशी से स्वागत किया और इस दौरान दोनों नेताओं के बीच आगामी संगठनात्मक गतिविधियों व रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा हुई। इसके बाद, शहर में आयोजित ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए इमरान प्रतापगढ़ी ने मंच से केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वर्तमान अव्यवस्था के चलते शिक्षा विभाग पूरी तरह से आईसीयू में वेंटिलेटर पर है। उन्होंने देश भर में लगातार हो रहे पेपर लीक मामलों को छात्रों के

 भविष्य के साथ खिलवाड़ करार दिया और हाल ही में 21 छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या की घटनाओं को सिस्टम की विफलता का काला अध्याय बताया। प्रतापगढ़ी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छात्रों की यह शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी और वे इस मुद्दे को सड़क से लेकर संसद तक पुरजोर तरीके से उठाएंगे।


 उन्होंने बिलासपुर के छात्र-छात्राओं के साथ हुए संवाद से निकले निष्कर्षों को सदन में रखने का भरोसा दिलाया और मांग की कि जब तक जवाबदेही तय करते हुए शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, तब तक कांग्रेस पार्टी छात्र हित में अपनी संघर्ष यात्रा जारी रखेगी।

Friday, July 10, 2026

होली क्रॉस सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लालखदान में विद्यार्थी परिषद का भव्य गठन समारोह हुआ संपन्न ।


बिलासपुर –होली क्रॉस सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लालखदान में विद्यार्थी परिषद गठन समारोह का आयोजन अत्यंत उत्साह एवं गरिमामय वातावरण में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इस अवसर पर भारत माता हिंदी मीडियम स्कूल के प्राचार्य फॉदर प्रमोद बारा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। एवं विशिष्ठ अतिथि रहे ग्रेंड न्यूज के संवाददाता श्री पुरुषोत्तम दुबे थे विद्यालय परिवार ने पुष्पगुच्छ एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर उनका आत्मीय स्वागत किया।कार्यक्रम में नवगठित विद्यार्थी परिषद के पदाधिकारियों को उनके दायित्वों से अवगत कराया गया तथा विद्यालय एवं समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, नेतृत्व और सेवा-भाव से कार्य करने की शपथ दिलाई गई।

समारोह को विद्यार्थियों की मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने और भी आकर्षक बना दिया। रंगारंग संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुतियों ने उपस्थित सभी अतिथियों एवं अभिभावकों का मन मोह लिया। विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए।मुख्य अतिथियो ने अपने प्रेरणादायक उद्बोधन में विद्यार्थियों को नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, ईमानदारी एवं जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद विद्यालय के अनुशासन एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त माध्यम है।


विद्यालय के प्राचार्या डॉ सिस्टर क्लेरिटा डिमैलो ने सभी नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ देते हुए आशा व्यक्त की कि वे विद्यालय की गरिमा को बनाए रखते हुए अपने उत्तरदायित्वों का उत्कृष्ट निर्वहन करेंगे।


कार्यक्रम का सफल संचालन विद्यालय के शिक्षकों द्वारा किया गया ।

Sunday, June 21, 2026

योग ही स्वस्थ और संतुलित जीवन का आधार_रविंद्र सिंह

बिलासपुर –अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ योग आयोग के पूर्व सदस्य रविंद्र सिंह ने योग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योग आज हम सभी के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है, जो न केवल शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचय कर हमारी दिनचर्या को व्यवस्थित करने का भी सशक्त माध्यम है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक स्वस्थ जीवन और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए योग के जरिए तन और मन को शुद्ध व मजबूत बनाना अनिवार्य है, विशेषकर प्रतिस्पर्धा के इस आधुनिक दौर में, जहाँ शारीरिक और मानसिक स्थिति को सुदृढ़ रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है। श्री सिंह ने योग को रोगों से मुक्ति का



 एकमात्र साधन बताते हुए इसके व्यापक प्रचार-प्रसार का आह्वान किया और सुझाव दिया कि योग को स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, मंदिरों और धर्मशालाओं जैसे हर क्षेत्र में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए ताकि प्रदेश और देश में एक स्वस्थ समाज की स्थापना हो सके। उन्होंने विशेष रूप से नई पीढ़ी के भविष्य पर चिंता जताते हुए कहा कि आज की अव्यवस्थित जीवनशैली, खान-पान की गलत आदतों, भागदौड़ और तनाव भरे माहौल में बच्चों को नशा व मानसिक दबाव से बचाने के लिए उन्हें नियमित रूप से योग से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि योग ही वह माध्यम है जिससे हम एक संतुलित और अनुशासित जीवन यापन कर सकते हैं......

Wednesday, June 10, 2026

छात्रावास अधीक्षक संघ ने बढ़ाई मांग: महंगाई के दौर में शिष्यवृत्ति और अनुरक्षण मद में अविलंब वृद्धि की आवश्यकता

बिलासपुर–(10 जून 2026)छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय छात्रावास अधीक्षक संघ (जिला इकाई, बिलासपुर) ने आज मुख्यमंत्री महोदय के नाम एक ज्ञापन सौंपते हुए छात्रावासों की बदहाल स्थिति और विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संघ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2022 से अब तक विद्यार्थियों की शिष्यवृत्ति राशि में कोई संशोधन नहीं किया गया है, जबकि इस बीच खाद्य सामग्री, दूध, सब्जी, फल और रसोई गैस जैसी दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आया है। इस बढ़ती महंगाई के कारण वर्तमान में निर्धारित राशि में विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण और संतुलित भोजन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिससे उनके पोषण स्तर पर विपरीत प्रभाव पड़ने का खतरा पैदा हो गया है। इसके अतिरिक्त, संघ ने 'अनुरक्षण मद'


 (Maintenance Fund) की अनियमितता का मुद्दा उठाते हुए बताया कि अधिकांश छात्रावासों को मरम्मत, स्वच्छता, पेयजल और विद्युत व्यवस्था के लिए समय पर फंड नहीं मिल पा रहा है। इन आवश्यक सुविधाओं के अभाव में अधीक्षक सीमित संसाधनों के साथ छात्रावास का संचालन करने को मजबूर हैं, जिससे बुनियादी ढांचा लगातार कमजोर होता जा रहा है। अपनी मांगों को प्रमुखता से रखते हुए संघ ने शासन से आग्रह किया है कि विद्यार्थियों के व्यापक हित में शिष्यवृत्ति की राशि में तत्काल यथोचित वृद्धि की जाए और अनुरक्षण मद को नियमित किया जाए, ताकि विद्यार्थियों को एक बेहतर आवासीय और शैक्षणिक वातावरण मिल सके। इस ज्ञापन सौंपने के दौरान बिलासपुर छात्रावास अधीक्षक संघ के जिला अध्यक्ष श्री विकास तिवारी सहित उपाध्यक्ष पामेन्द्र कुर्रे, प्रफुल्ल शर्मा, देवेंद्र पाण्डेय, आलोक शर्मा, राहुल साहू, एल महेश्वर राव, प्रकाश शर्मा, शुखदेव सोनी एवं जिले के समस्त छात्रावास अधीक्षक उपस्थित रहे।


Saturday, May 23, 2026

ऑल इंडिया इंडोर आर्चरी ओपन टूर्नामेंट के लिए गोवा रवाना हुए नीतीश रत्नेश, राष्ट्रीय मंच पर अकेले करेंगे छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व

ऑल इंडिया इंडोर आर्चरी ओपन टूर्नामेंट के लिए गोवा रवाना हुए नीतीश रत्नेश, राष्ट्रीय मंच पर अकेले करेंगे छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व

बिलासपुर – बिलासपुर स्थित होली क्रॉस स्कूल, लाल खदान के होनहार और बेहद प्रतिभाशाली छात्र नीतीश रत्नेश 1st ऑल इंडिया इंडोर आर्चरी ओपन टूर्नामेंट 2026 में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के लिए स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रायपुर से गोवा के लिए रवाना हो गए हैं, जिससे पूरे प्रदेश और खेल जगत में हर्ष का माहौल है। इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में सबसे खास और गौरव की बात यह है कि नीतीश रत्नेश छत्तीसगढ़ राज्य से प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट लगन और खेल के प्रति बेजोड़ समर्पण के दम पर इस मुकाम को हासिल किया है। नीतीश की यह असाधारण उपलब्धि न



 केवल बिलासपुर और उनके स्कूल परिवार के लिए सम्मान की बात है, बल्कि क्षेत्र के अन्य उभरते युवाओं और खिलाड़ियों के लिए भी एक महान प्रेरणास्रोत बनकर उभरी है। अपनी लगन और अनुशासन से यह साबित करने वाले नीतीश की इस सफलता पर स्कूल प्रबंधन, शिक्षकगण, खेल प्रेमियों और समस्त क्षेत्रवासियों ने गहरा गर्व व्यक्त किया है; अब सभी की दुआएं और शुभकामनाएं नीतीश के साथ हैं कि वे इस राष्ट्रीय मंच पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर बिलासपुर और पूरे छत्तीसगढ़ का नाम देशभर में रोशन करेंगे.....


पृथ्वीराज चौहान की वह जंग जिसे हर भारतीय को जानना चाहिए

तराइन का दूसरा युद्ध (1192 ई.) – जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी भारतीय इतिहास में कई युद्ध ऐसे हुए जिन्होंने केवल दो सेनाओं के बीच जीत-...