शीर्षक:–जिस्म में लोहे सा दम या पैकेटबंद मौत का जहर
जहाँ आज हमारी आधुनिक और रफ्तार भरी जिंदगी ने हमें सुपरमार्केट की चमकीली पन्नी और फ्रिज के ठंडे जहर का गुलाम बना दिया है, वहीं अगर हम अपने पूर्वजों की उस सोंधी और प्राणवान थाली पर एक सरसरी नजर डालें, तो जमीन आसमान का यह ऐसा खौफनाक और चीरफाड़ करने वाला फर्क साफ दिखाई देता है कि जिसे पढ़कर आज की इस एस्प्रिन और इंसुलिन पर पलने वाली पीढ़ी की रूह काँप जाएगी और रगों में खौलता हुआ लावा दौड़ पड़ेगा। जरा सोचिए, उस दौर की मिसाल जब हमारे बुजुर्ग सुबह-सुबह कोहरे की चादर के बीच उठकर खेतों की उपजाऊ और रसायन-मुक्त मिट्टी से उपजे बाजरे, ज्वार और मक्के की उस सोंधी रोटी को अपने हाथों से मथकर निकाले गए शुद्ध और ताज़े मक्खन व गाढ़े देसी घी के साथ बड़े चाव से खाते थे, जो उनके जिस्म में लोहे जैसी फौलादी ताकत और हड्डियों में पहाड़ जैसा दम भर देता था, जबकि आज का यह कॉर्पोरेट युग में जीने वाला इंसान अपनी 24वीं-25वीं मंजिल के कांच वाले कमरों में बैठकर फैक्ट्रियों में जहरीले हेक्सेन केमिकल और हाई-टेंपरेचर की भट्टियों से पकाए गए उस तथाकथित 'रिफाइंड ऑयल' और मैदे से बनी जानलेवा ब्रेड-नूडल्स को गटक रहा है, जिसने महज तीस साल की उम्र में ही युवाओं को फैटी लिवर, हार्ट अटैक और कम उम्र की डायबिटीज जैसी लाइलाज बीमारियों का लाचार गुलाम बना डाला है। जरा कल्पना कीजिए उस प्राचीन संस्कृति की जहाँ ताँबे के बर्तन और मिट्टी के उस मटके का अमृत तुल्य शीतल जल पिया जाता था जो पेट की हर एक आग को शांत कर आंतरिक शुद्धि देता था, उसके मुकाबले आज का युवा अपनी प्यास बुझाने के लिए उन रंग-बिरंगी बोतलों में भरी कोल्ड ड्रिंक्स और सोडे को गटकता है जिनमें सात-सात चम्मच घुली हुई चीनी सीधे उसके अग्नाशय और हड्डियों को अंदर से दीमक की तरह चाट रही है, और तो और, जब हमारे पुरखों का खान-पान एक पवित्र संस्कार हुआ करता था जहाँ वे परिवार के साथ जमीन पर पालथी मारकर बैठते थे, हर एक कौर को इत्मीनान से 32 बार चबाकर अपनी लार के साथ अमृत बनाकर भीतर उतारते थे ताकि पाचन तंत्र हमेशा वज्र जैसा मजबूत रहे, तो इसके ठीक उलट आज का यह आधुनिक मानव डाइनिंग टेबल या ऑफिस की कुर्सियों पर एक हाथ में मोबाइल की नीली स्क्रीन पर अंतहीन रील्स को स्वाइप करते हुए और दूसरे हाथ में प्रिजर्वेटिव्स से सड़े हुए पैकेटबंद जंक फूड को बिना चबाए ऐसे गटक जाता है जैसे किसी मवेशी को चारा ठूसा जा रहा हो, जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास भले ही स्वाद के नाम पर दुनिया भर के रेस्टोरेंट, महंगे पिज़्ज़ा-बर्गर और लाखों डिग्रियाँ मौजूद हों, लेकिन वह नैसर्गिक ऊर्जा, वह बुलंद हौसला और वह मानसिक सुकून हमेशा के लिए गायब हो चुका है जो कभी हमारे उन बुजुर्गों की थाली की शान हुआ करता था जो बिना किसी डॉक्टर, बिना किसी मेडिक्लेम और बिना किसी अस्पताल की देहरी लाँघे हँसते-खेलते सौ साल की फौलादी जिंदगी जी जाते थे, इसलिए अब भीवक्त है कि इस अंधी और विनाशकारी डिजिटल दौड़ से बाहर निकलकर अपनी जड़ों की उस सोंधी महक को पहचानिए, क्योंकि अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कोसेगी कि हमने स्वाद के चक्कर में अपनी सेहत, अपनी संस्कृति और अपनी नस्ल दोनों को बाजार के हाथों नीलाम कर दिया।


















































