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स्मार्ट मीटर और बढ़े बिजली बिल के खिलाफ कांग्रेस का घर-घर दस्तक अभियान, रविंद्र सिंह बोले—400 यूनिट तक बिल हाफ योजना फिर शुरू हो...
बिलासपुर। शहर में स्मार्ट मीटर, बढ़े हुए बिजली के दाम, गलत बिजली बिल और लगातार हो रही अघोषित बिजली कटौती को लेकर कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी और जिला शहर कांग्रेस कमेटी के तत्वावधान में कांग्रेस कार्यकर्ता वार्डों और गलियों में घर-घर पहुंचकर आम लोगों और व्यापारियों से बिजली संबंधी समस्याओं पर चर्चा कर शिकायत फॉर्म भरवा रहे हैं। इसी कड़ी में विद्या नगर, विनोबा नगर, क्रांति नगर, शेष कॉलोनी, डिपूपारा और लिंक रोड क्षेत्र में कांग्रेसजनों ने लोगों से संपर्क कर उनकी शिकायतें दर्ज कीं। जिला शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र सिंह
बिलासपुर। भारतीय जनता पार्टी बिलासपुर ग्रामीण में संगठन ने मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ भाजपा नेता शमशेर सिंह (उदय) पर भरोसा जताते हुए उन्हें जिला मीडिया सहसंयोजक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। प्रदेश नेतृत्व की सहमति से जिलाध्यक्ष मोहित जायसवाल ने जिला मीडिया प्रभारी एवं सहप्रभारियों के दायित्वों की घोषणा की है। नियुक्ति के तहत बेलतरा विधानसभा से अनमोल कुमार झा को जिला मीडिया संयोजक, मस्तूरी विधानसभा से शमशेर सिंह (उदय) और कोटा
विधानसभा से संजय सोनी को जिला सहसंयोजक बनाया गया है। नई जिम्मेदारी मिलने के बाद उदय सिंह के समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है। संगठन ने उम्मीद जताई है कि उदय सिंह जिले में पार्टी की गतिविधियों, जनकल्याणकारी योजनाओं और संगठनात्मक कार्यक्रमों की जानकारी प्रभावी तरीके से मीडिया और आम जनता तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। साथ ही पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुंचाने तथा संगठन को और मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता में बिलासपुर की इच्छा नेताम का शानदार प्रदर्शन, कांस्य पदक जीतकर बढ़ाया शहर का मान
बिलासपुर। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के चिन्सुरह में 7 से 9 अगस्त तक राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। कराटे एसोसिएशन ऑफ इंडिया (KAI) के तत्वावधान में आयोजित इस प्रतियोगिता में देशभर के विभिन्न राज्यों से करीब 3 हजार खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। छत्तीसगढ़ से भी 52 खिलाड़ियों ने प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी खेल प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
प्रतियोगिता में बिलासपुर की युवा कराटे खिलाड़ी इच्छा नेताम ने बालिका वर्ग की 17 वर्ष आयु श्रेणी में शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। उनकी इस उपलब्धि से बिलासपुर के खेल जगत में खुशी का माहौल है। इच्छा की सफलता को स्थानीय स्तर पर उभरते खिलाड़ियों के लिए प्रेरणादायक उपलब्धि माना जा रहा है।
आज जिस जगह पर रायपुर जंक्शन दिखाई देता है, वहां 19वीं सदी में आज जैसी रेल लाइन, प्लेटफॉर्म और स्टेशन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
रायपुर उस समय छत्तीसगढ़ के प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्रों में गिना जाता था। शहर का इतिहास रेलवे से कहीं पुराना है। जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार रायपुर का अस्तित्व कम से कम 9वीं शताब्दी से माना जाता है और लंबे समय तक यह क्षेत्र अलग-अलग राजवंशों के अधीन रहा। बाद के दौर में रायपुर हैहयवंशी शासकों से भी जुड़ा रहा।
रेलवे आने से पहले रायपुर और आसपास के इलाकों में आवागमन मुख्य रूप से सड़क, बैलगाड़ी और स्थानीय व्यापारिक मार्गों से होता था। धान और दूसरे कृषि उत्पादों के कारण छत्तीसगढ़ का इलाका व्यापार की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, लेकिन बड़ी मंडियों और दूर के बाजारों तक माल पहुंचाना कठिन और धीमा था।
रायपुर तक रेलवे पहुंचने की कहानी वास्तव में 1860 के दशक से शुरू होती है।
1909 के तत्कालीन रायपुर जिला गजेटियर में दर्ज जानकारी के अनुसार, नागपुर से छत्तीसगढ़ के बड़े अनाज उत्पादक क्षेत्र को जोड़ने के लिए हल्की रेलवे/ट्रामवे जैसी व्यवस्था का विचार लगभग 1863 में सर आर. टेम्पल द्वारा सामने रखा गया था।
लेकिन आर्थिक और दूसरी कठिनाइयों के कारण काम तुरंत शुरू नहीं हो सका। अंततः नागपुर से राजनांदगांव तक मीटर गेज लाइन बनाई गई और यह लाइन 1882 में शुरू हुई।
इसके बाद रेलवे नेटवर्क को आगे बढ़ाने की योजना बनी।
रायपुर के लिए निर्णायक वर्ष आया 1888।
उस समय बंगाल नागपुर रेलवे यानी Bengal-Nagpur Railway (BNR) के दौर में नागपुर से आगे रेलवे लाइन का विस्तार किया गया। रेलवे के आधिकारिक दक्षिण पूर्व रेलवे इतिहास दस्तावेज में नागपुर-रायपुर लाइन के निर्माण का वर्ष 1888 दर्ज है।
1909 के ऐतिहासिक गजेटियर के अनुसार, बंगाल-नागपुर रेलवे कंपनी के गठन के बाद नागपुर-राजनांदगांव वाली पुरानी लाइन को ब्रॉड गेज में बदला गया और रेलवे को राजनांदगांव से रायपुर तक 1888 में बढ़ाया गया।
यही वह दौर था जब रायपुर रेलवे नेटवर्क से सीधे जुड़ा।
आज रायपुर जंक्शन की स्थापना/उद्घाटन का वर्ष सामान्यतः 1888 माना जाता है।
यह समझना जरूरी है कि रायपुर स्टेशन को आज की तरह किसी एक व्यक्ति ने अकेले बनवाया नहीं था।
उस दौर में रेलवे का निर्माण ब्रिटिश भारत की रेलवे कंपनियों और औपनिवेशिक प्रशासन की परियोजनाओं के तहत होता था। रायपुर तक रेलवे लाइन का निर्माण Bengal-Nagpur Railway (BNR) के विस्तार का हिस्सा था।
BNR की स्थापना 1887 में हुई थी। इसका उद्देश्य नागपुर क्षेत्र की पुरानी रेलवे व्यवस्था को विकसित करना और उसे आगे छत्तीसगढ़ होते हुए पूर्वी भारत के बड़े रेलवे नेटवर्क से जोड़ना था।
इसलिए रायपुर रेलवे स्टेशन के निर्माण को किसी एक राजा, जमींदार या स्थानीय नेता द्वारा बनवाया गया स्टेशन कहना सही नहीं होगा। यह उस समय के बड़े BNR रेलवे विस्तार अभियान का हिस्सा था।
रेलवे ने रायपुर की अर्थव्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया।
पहले जहां बैलगाड़ियों के जरिए माल दूर के बाजारों तक पहुंचाया जाता था, वहीं रेलवे ने बड़े पैमाने पर माल ढुलाई संभव कर दी।
छत्तीसगढ़ के धान और दूसरे कृषि उत्पादों के अलावा आसपास के क्षेत्रों के खनिज और औद्योगिक सामान के आवागमन में भी रेलवे की भूमिका बढ़ने लगी।
रेलवे स्टेशन के आसपास व्यापारिक गतिविधियां बढ़ीं। बाहर से व्यापारी, कर्मचारी, मजदूर और दूसरे लोग रायपुर आने लगे।
यही रेलवे धीरे-धीरे रायपुर शहर के विस्तार का एक महत्वपूर्ण आधार बन गई।
रायपुर तक रेलवे पहुंचने के बाद विस्तार रुका नहीं।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, रेलवे लाइन 1889 में बिलासपुर तक पहुंची और आगे यह नेटवर्क पूर्व की ओर बढ़ता गया।
इसके बाद रायपुर का संपर्क बड़े रेलवे नेटवर्क से मजबूत होता गया।
1900 तक खड़गपुर के रास्ते कलकत्ता से सीधा संपर्क भी स्थापित हो गया। इसका मतलब यह था कि रायपुर अब केवल स्थानीय व्यापारिक केंद्र नहीं रहा, बल्कि देश के बड़े व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा बन चुका था।
रायपुर के रेलवे इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय रायपुर-धमतरी नैरो गेज लाइन है।
यह लाइन 1900 में शुरू हुई और रायपुर को धमतरी से जोड़ती थी। लगभग 56 किलोमीटर की इस लाइन से रायपुर और आसपास के क्षेत्रों का संपर्क मजबूत हुआ।
बाद में 1909 में अभनपुर से राजिम तक शाखा लाइन भी बनाई गई।
यह लाइन लंबे समय तक क्षेत्रीय यातायात और माल ढुलाई में महत्वपूर्ण रही। बाद में नैरो गेज सेवाएं समाप्त हुईं और इस नेटवर्क का स्वरूप बदल गया।
रायपुर स्टेशन का महत्व तब और बढ़ा जब अलग-अलग दिशाओं से आने वाली रेलवे लाइनें यहां जुड़ने लगीं।
मुख्य नागपुर-बिलासपुर दिशा के अलावा रायपुर से पूर्व और दक्षिण-पूर्व की तरफ रेलवे संपर्क विकसित हुआ।
रायपुर-विजयनगरम दिशा की लाइन का निर्माण 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में हुआ। दक्षिण पूर्व रेलवे के इतिहास दस्तावेज में रायपुर-विजयनगरम लाइन के निर्माण की अवधि 1906 से 1930 दर्ज है।
इस तरह रायपुर सिर्फ रास्ते में आने वाला स्टेशन नहीं रहा, बल्कि रेलवे नेटवर्क का महत्वपूर्ण जंक्शन बन गया।
रायपुर स्टेशन के शुरुआती दिनों में ट्रेनें भाप के इंजनों से चलती थीं।
उस समय रेलवे स्टेशन का दृश्य आज से बिल्कुल अलग रहा होगा—भाप छोड़ते इंजन, कोयले से चलने वाली रेलगाड़ियां, माल ढुलाई, सीमित प्लेटफॉर्म और यात्रियों की अपेक्षाकृत छोटी संख्या।
बाद में रेलवे के विद्युतीकरण का दौर आया।
बिलासपुर-भिलाई क्षेत्र में विद्युतीकरण का काम 1935-45 के बीच हुआ। इससे रायपुर क्षेत्र में रेल संचालन धीरे-धीरे आधुनिक विद्युत रेलवे व्यवस्था की तरफ बढ़ा।
1947 में देश आजाद हुआ तो रेलवे का नियंत्रण भारतीय व्यवस्था के हाथों में आया।
समय के साथ अलग-अलग रेलवे कंपनियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का विलय हुआ और भारतीय रेलवे का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ।
रायपुर भी इस बदलाव के साथ आगे बढ़ता गया।
रेलवे स्टेशन के आसपास व्यापारिक क्षेत्र बढ़े। शहर का विस्तार हुआ और रायपुर धीरे-धीरे मध्य भारत के महत्वपूर्ण शहरों में शामिल होने लगा।
1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना और रायपुर को राज्य की राजधानी बनाया गया।
इसके बाद रायपुर का महत्व तेजी से बढ़ा।
सरकारी कार्यालय, कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ने लगीं। इसका सीधा असर रेलवे पर भी पड़ा।
राजधानी बनने के बाद रायपुर स्टेशन पर यात्रियों की संख्या और ट्रेनों की जरूरत लगातार बढ़ती गई।
रायपुर के रेलवे इतिहास में 1 अप्रैल 2003 एक महत्वपूर्ण तारीख है।
इसी दिन रायपुर रेलवे डिवीजन अस्तित्व में आया और इसका मुख्यालय रायपुर में बनाया गया।
रायपुर रेलवे डिवीजन दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे यानी South East Central Railway (SECR) का हिस्सा है।
इसके साथ रायपुर केवल एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन नहीं रहा, बल्कि एक बड़े रेलवे प्रशासनिक केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ।
समय के साथ स्टेशन पर प्लेटफॉर्म बढ़े, फुट ओवरब्रिज, यात्री सुविधाएं, टिकट व्यवस्था, प्रतीक्षालय, पार्किंग और दूसरी सुविधाएं विकसित होती गईं।
आज रायपुर जंक्शन देश के महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों में शामिल है।
यह बिलासपुर-नागपुर रेल मार्ग पर स्थित है और रायपुर से दूसरी दिशाओं में जाने वाले रेल मार्गों के कारण इसका परिचालन महत्व बहुत बड़ा है।
वर्तमान व्यवस्था में रायपुर जंक्शन पर सात प्लेटफॉर्म हैं और स्टेशन भारतीय रेलवे की महत्वपूर्ण श्रेणी के स्टेशनों में आता है।
रायपुर जंक्शन का विकास अभी खत्म नहीं हुआ है।
2026 की रिपोर्टों के अनुसार, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे रायपुर क्षेत्र में रेलवे क्षमता बढ़ाने की बड़ी योजना पर काम कर रहा है।
रायपुर जंक्शन पर यातायात का दबाव कम करने और नई ट्रेनों के संचालन की क्षमता बढ़ाने के लिए नवा रायपुर के केंद्री में नया कोचिंग टर्मिनल विकसित करने की योजना है।
इस प्रस्तावित टर्मिनल में नौ प्लेटफॉर्म के साथ पिट लाइन, स्टेबलिंग लाइन और दूसरी परिचालन सुविधाएं विकसित करने की योजना बताई गई है।
रायपुर जंक्शन के आधुनिकीकरण के लिए लगभग 456 करोड़ रुपये के उन्नयन कार्यों का भी उल्लेख किया गया है।
रायपुर क्षेत्र में चौथी रेल लाइन और आधुनिक सिग्नलिंग जैसी परियोजनाएं भी रेलवे क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
1863 — नागपुर और छत्तीसगढ़ के अनाज उत्पादक क्षेत्र को रेलवे से जोड़ने का विचार सामने आया।
1882 — नागपुर से राजनांदगांव तक मीटर गेज रेलवे शुरू हुई।
1887 — Bengal-Nagpur Railway का गठन हुआ।
1888 — रेलवे लाइन राजनांदगांव से रायपुर तक पहुंची; रायपुर स्टेशन के इतिहास का निर्णायक वर्ष।
1889 — रेलवे नेटवर्क बिलासपुर तक बढ़ा।
1891 — नागपुर-आसंसोल मुख्य रेल संपर्क विकसित हुआ।
1900 — रायपुर-धमतरी नैरो गेज लाइन शुरू हुई।
1909 — अभनपुर-राजिम शाखा लाइन विकसित हुई।
1906-1930 — रायपुर-विजयनगरम रेल संपर्क का निर्माण विभिन्न चरणों में हुआ।
1935-45 — क्षेत्र में विद्युतीकरण का दौर शुरू हुआ।
1947 के बाद — भारतीय रेलवे के राष्ट्रीय स्वरूप में रायपुर की भूमिका बढ़ी।
2000 — छत्तीसगढ़ राज्य बना और रायपुर राजधानी बना।
2003 — रायपुर रेलवे डिवीजन का गठन हुआ।
2020 के दशक — स्टेशन और आसपास के रेलवे नेटवर्क में आधुनिक यात्री सुविधाओं तथा क्षमता विस्तार पर जोर बढ़ा।
2026 — रायपुर जंक्शन पर बढ़ते यातायात को देखते हुए आधुनिकीकरण और नवा रायपुर में नए कोचिंग टर्मिनल जैसी बड़ी योजनाओं पर काम आगे बढ़ रहा है।
रायपुर जंक्शन की कहानी को सिर्फ एक रेलवे स्टेशन की कहानी कहना इसके महत्व को छोटा करना होगा।
रेलवे आने से पहले रायपुर एक पुराना व्यापारिक और प्रशासनिक शहर था। 1888 में रेलवे पहुंचने के बाद रायपुर की आर्थिक दिशा बदलने लगी।
रेलवे ने यहां व्यापार को गति दी, बाहर से लोगों का आना बढ़ाया, शहर के आसपास नई बस्तियां और बाजार विकसित हुए और रायपुर धीरे-धीरे एक बड़े क्षेत्रीय केंद्र में बदल गया।
फिर बिलासपुर, नागपुर, पूर्वी भारत और दक्षिण-पूर्व की ओर रेल संपर्क बढ़ता गया। आज वही रायपुर जंक्शन, जहां कभी भाप का इंजन और सीमित यात्री सुविधाएं थीं, आधुनिक भारतीय रेलवे के व्यस्त केंद्रों में शामिल है।
इस लिहाज से 1888 से 2026 तक रायपुर जंक्शन का सफर केवल पटरियों और ट्रेनों का सफर नहीं है—यह रायपुर शहर के विकास, व्यापार, उद्योग और अंततः छत्तीसगढ़ की राजधानी बनने की पूरी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बिलासपुर -दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने अपने विस्तृत रेल नेटवर्क पर सुरक्षित और सुचारू रेल संचालन को मजबूत करने के लिए ट्रैक रखरखाव के काम में आधुनिक तकनीक और बेहतर कार्ययोजना का इस्तेमाल किया है। लगभग 5,500 ट्रैक किलोमीटर के नेटवर्क पर मौजूदा वित्तीय वर्ष में अत्याधुनिक ट्रैक मशीनों की मदद से 2,042 किलोमीटर प्लेन ट्रैक टैम्पिंग, 907 टर्नआउट टैम्पिंग, 102 किलोमीटर डीप बैलास्ट स्क्रीनिंग, 50 किलोमीटर ट्रैक नवीनीकरण और 58 टर्नआउट का नवीनीकरण पूरा किया गया है। खास बात यह है कि इन कार्यों को उपलब्ध ट्रैफिक ब्लॉकों का बेहतर उपयोग करते हुए समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है। नागपुर-झारसुगुड़ा मुख्य रेलखंड पर 130 किलोमीटर प्रति घंटे तक की गति से ट्रेनों के सुरक्षित संचालन को देखते हुए ट्रैक की गुणवत्ता और रखरखाव पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। एसईसीआर के
विभिन्न मंडलों में 92 अत्याधुनिक ट्रैक मशीनें कार्यरत हैं, जिनके संचालन और रखरखाव के लिए करीब 900 प्रशिक्षित कर्मचारी चौबीसों घंटे अपनी सेवाएं दे रहे हैं। आधुनिक मशीनों और कुशल कर्मचारियों के इस समन्वय से ट्रैक की ज्यामितीय गुणवत्ता बनाए रखने,
सड़क पर गड्ढे, नाली की समस्या और अंधेरा… वार्ड के लोग बोले- कब बदलेगी तस्वीर?
बिलासपुर। शहर के कई इलाकों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर लोगों की परेशानियां लगातार सामने आ रही हैं। कहीं सड़क पर बने गड्ढे हादसों को न्योता दे रहे हैं, तो कहीं नाली और सफाई व्यवस्था की कमी से रहवासी परेशान हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है।
बारिश में बढ़ जाती है परेशानी
रहवासियों के मुताबिक बारिश के दिनों में खराब सड़क और जल निकासी की समस्या सबसे बड़ी परेशानी बन जाती है। कई जगह पानी जमा होने से लोगों को आने-जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और दोपहिया वाहन चालकों को ज्यादा परेशानी होती है।
लोगों ने उठाई आवाज
स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र के विकास और सुविधाओं को लेकर कई बार जिम्मेदारों का ध्यान आकर्षित कराया गया, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। लोगों ने मांग की है कि सड़क मरम्मत, नाली सफाई और स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत सुविधाओं पर जल्द ध्यान दिया जाए।
जिम्मेदारों से उम्मीद
लोगों का कहना है कि शहर के विकास के लिए जरूरी है कि जमीनी स्तर की समस्याओं का समय पर समाधान हो। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस समस्या को कितनी जल्दी दूर करता है।
चुनाव को महीनों बीते, न नाली बनी और न हटा अतिक्रमण, आखिर निशाने पर सिर्फ एक स्कूल क्यों?
बिलासपुर –पंचायत चुनाव संपन्न हुए भी काफी समय बीत चुका है, लेकिन लालखदान चौकसे कॉलेज रोड की सबसे बड़ी समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है। न तो पूरे नाले का निर्माण हो सका और न ही वर्षों से नाले के ऊपर किए गए अवैध कब्जों को हटाने की कोई प्रभावी पहल दिखाई दी। स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई केवल हॉली क्रॉस स्कूल के सामने तक सीमित दिखाई दे रही है, जबकि उसी मार्ग पर कई स्थानों पर नाले के ऊपर सड़कें, मकान और अन्य निर्माण आज भी मौजूद हैं। इससे यह सवाल उठना
स्वाभाविक है कि आखिर कार्रवाई का दायरा सिर्फ एक ही स्थान तक क्यों सीमित रखा गया। फिलहाल हम किसी जनप्रतिनिधि का नाम नहीं ले रहे हैं, लेकिन यदि स्थिति इसी तरह बनी रही और जिम्मेदार लोग जवाबदेही से बचते रहे तो स्थानीय लोगों द्वारा उठाए जा रहे सवालों और तथ्यों के आधार पर संबंधित जनप्रतिनिधियों की भूमिका तथा पूरे
मामले की परतें भी सार्वजनिक की जाएंगी। जनता का कहना है कि शिक्षा के मंदिर को असुविधा में डालने के बजाय पूरे क्षेत्र की समस्या का समान रूप से समाधान होना चाहिए। यदि कहीं अतिक्रमण है तो उस पर भी एक जैसी कार्रवाई हो, अन्यथा चयनात्मक कार्रवाई जनप्रतिनिधियों की मंशा पर सवाल खड़े करती रहेगी।
शीर्षक: सड़क सुरक्षा नियम और हमारी जिम्मेदारी
सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए यातायात नियमों का पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है। वाहन चलाते समय हेलमेट या सीट बेल्ट का उपयोग करना, तय गति सीमा में गाड़ी चलाना और नशे की हालत में वाहन न चलाना जीवन की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। थोड़ी सी सावधानी और समझदारी हमारे और हमारे परिवार की जान बचा सकती है।
बिलासपुर में हर नारी रोजगार फाउंडेशन, लायंस क्लब बिलासपुर और शक्ति क्लब के संयुक्त तत्वावधान में होटल इंटरसिटी, जगमल चौक में भव्य सावन उत्सव का आयोजन उत्साह और पारंपरिक रंगों के बीच संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि भाजपा नेत्री किरण सिंह तथा विशिष्ट अतिथि जीएमटी कोऑर्डिनेटर लायन चंदा बंसल और जीएलटी कोऑर्डिनेटर लायन फरहीन चिश्ती द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। अतिथियों ने महिलाओं को
समाजसेवा, आत्मनिर्भरता और संगठन से जुड़कर आगे बढ़ने का संदेश देते हुए घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित करने की पहल की सराहना की। कार्यक्रम में सावन की थीम पर मेहंदी, हेयर स्टाइल, टैलेंट हंट, सावन सुंदरी सहित कई आकर्षक प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिनमें शिवांगी दीप सोनी ने सावन सुंदरी का खिताब जीता, जबकि मेहंदी, हेयर स्टाइल और टैलेंट हंट के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
आकर्षण घरेलू उद्योग चलाने वाली महिलाओं द्वारा लगाए गए स्टॉल रहे, जहां उनके उत्पादों को भरपूर सराहना मिली। आयोजन को सफल बनाने में होटल इंटरसिटी के हरदीप सिंह सलूजा, अरविंद वर्मा, मधु शर्मा और रोशनी दीक्षित सहित सभी आयोजकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पूरे आयोजन में पारंपरिक संस्कृति, महिला प्रतिभा, स्वरोजगार और सामाजिक सरोकारों का सुंदर संगम देखने को मिला।
बिलासपुर शहर में बदमाशों के हौसले किस कदर बुलंद हैं, इसका एक और सनसनीखेज मामला सिविल लाइन थाना क्षेत्र से सामने आया है। बृहस्पति बाजार में सब्जी खरीदने गई बुजुर्ग महिला विद्या मोटवानी को दो शातिर बदमाशों ने बड़ी ही चालाकी से अपना निशाना बनाया। पहले रास्ता पूछने के बहाने बातचीत शुरू की, फिर भरोसे में लेकर उन्हें जबरन ऑटो में बैठाया और नेहरू चौक की ओर ले गए। आरोप है कि रास्ते में महिला को कोई नशीला पदार्थ पिला दिया गया, जिससे उनकी हालत बिगड़ गई और उनकी सुध-बुध पूरी तरह खत्म हो गई। इसी मौके का फायदा उठाते हुए आरोपियों ने महिला के हाथों से सोने की अंगूठी, चूड़ियां समेत कीमती जेवर उतरवा लिए और उन्हें बेसहारा छोड़कर फरार हो गए। कुछ देर बाद होश आने पर महिला किसी तरह अपने घर पहुंची और पूरी घटना परिजनों को बताई, जिसके बाद परिवार में हड़कंप मच गया। पीड़ित परिवार तत्काल सिविल लाइन थाना पहुंचा और पूरे घटनाक्रम की शिकायत दर्ज कराई। परिजनों का कहना है कि बदमाश बेहद सुनियोजित तरीके से वारदात को अंजाम देकर फरार हुए हैं। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है, वहीं ऑटो और आरोपियों की पहचान के लिए पुलिस अलग-अलग बिंदुओं पर जांच कर रही है। दिनदहाड़े बुजुर्ग महिला को निशाना बनाकर अंजाम दी गई इस वारदात ने शहर में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस इन शातिर आरोपियों तक कब पहुंचती है और पीड़िता को न्याय कब मिलता है।
तराइन का दूसरा युद्ध (1192 ई.) – जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी
भारतीय इतिहास में कई युद्ध ऐसे हुए जिन्होंने केवल दो सेनाओं के बीच जीत-हार का फैसला नहीं किया, बल्कि पूरे देश के भविष्य को प्रभावित किया। ऐसा ही एक युद्ध था 1192 ईस्वी में लड़ा गया तराइन का दूसरा युद्ध, जिसमें दिल्ली और अजमेर के शक्तिशाली शासक पृथ्वीराज चौहान का सामना मोहम्मद गौरी से हुआ। इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध के परिणाम ने उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था को गहराई से बदल दिया। आज भी यह युद्ध वीरता, रणनीति, साहस और इतिहास से मिलने वाली सीख के कारण विशेष महत्व रखता है।
पृथ्वीराज चौहान अपने समय के सबसे शक्तिशाली राजपूत शासकों में गिने जाते थे। उनकी राजधानी अजमेर और दिल्ली तक फैली हुई थी। दूसरी ओर, मध्य एशिया से आया मोहम्मद गौरी भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। वर्ष 1191 में दोनों सेनाओं के बीच तराइन का पहला युद्ध हुआ, जिसमें पृथ्वीराज चौहान की सेना ने गौरी को पराजित किया। कहा जाता है कि इस हार के बाद गौरी पीछे हट गया, लेकिन उसने अपनी पराजय को अंतिम नहीं माना। उसने अपनी सेना को फिर से संगठित किया, नई रणनीति बनाई और अगले ही वर्ष पहले से अधिक तैयारी के साथ भारत लौट आया।
वर्ष 1192 में तराइन के मैदान में दोनों सेनाएं एक बार फिर आमने-सामने थीं। पृथ्वीराज चौहान की सेना में बड़ी संख्या में राजपूत योद्धा, घुड़सवार और हाथी थे, जबकि मोहम्मद गौरी की सेना तेज गति से चलने वाली घुड़सवार टुकड़ियों और तीरंदाजों से सुसज्जित थी। युद्ध के दौरान गौरी ने ऐसी रणनीति अपनाई जिसमें उसकी सेना बार-बार हमला कर पीछे हटती और फिर अचानक चारों ओर से घेरकर आक्रमण करती। लंबे संघर्ष के बाद राजपूत सेना की व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी और अंततः पृथ्वीराज चौहान को पराजय का सामना करना पड़ा।
तराइन के दूसरे युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसके बाद उत्तर भारत की सत्ता का संतुलन तेजी से बदल गया। पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद मोहम्मद गौरी का प्रभाव दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच गया। आगे चलकर उसके सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने शासन की नींव मजबूत की, जिससे दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। इतिहासकार इस युद्ध को इसलिए भी महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि इसके बाद उत्तर भारत की राजनीति, प्रशासन और सत्ता संरचना में बड़े परिवर्तन देखने को मिले।
पृथ्वीराज चौहान का नाम आज भी वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनके जीवन से जुड़ी कई लोककथाएं और साहित्यिक रचनाएं, विशेषकर पृथ्वीराज रासो, लोकप्रिय हैं।
तराइन का दूसरा युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह हमें कई महत्वपूर्ण सीख भी देता है। यह बताता है कि युद्ध में केवल वीरता ही नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति, आधुनिक सैन्य कौशल और समय के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही आवश्यक होती है। इतिहास का अध्ययन हमें अतीत को समझने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी बेहतर निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।
आज, आठ सौ से अधिक वर्ष बाद भी तराइन का युद्ध इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के अध्ययन का प्रमुख विषय बना हुआ है। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल बीते समय की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए सीख का स्रोत भी है। पृथ्वीराज चौहान का साहस और संघर्ष भारतीय इतिहास की अमूल्य विरासत का हिस्सा है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सही और तथ्यपरक रूप में पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी
अचानकमार के पक्षी: रंग-बिरंगे पंखों से गूंजता छत्तीसगढ़ का जंगल | पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग
बिलासपुर –जब भी अचानकमार टाइगर रिजर्व का नाम लिया जाता है, लोगों के मन में सबसे पहले बाघ, तेंदुआ और घने साल के जंगलों की तस्वीर उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह क्षेत्र पक्षियों की दुनिया का भी एक अनमोल खजाना है। यहां सुबह की पहली किरण के साथ जंगल पक्षियों की मधुर आवाज़ से जीवंत हो उठता है। पेड़ों की ऊंची शाखाओं, नदी-नालों के किनारों और घास के मैदानों में सैकड़ों पक्षी प्रजातियां अपना बसेरा बनाती हैं।
छत्तीसगढ़ के मुंगेली और बिलासपुर जिलों से जुड़े अचानकमार टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा घने साल, साजा, बीजा और मिश्रित वनों से आच्छादित है। यही कारण है कि यह क्षेत्र देश के प्रमुख बर्ड वॉचिंग स्थलों में गिना जाता है। यहां वर्षभर 150 से अधिक पक्षी प्रजातियां देखी जा सकती हैं। इनमें स्थानीय, दुर्लभ और कुछ प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं।
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पक्षियों के लिए स्वर्ग क्यों है अचानकमार?
अचानकमार में पक्षियों के लिए आदर्श वातावरण उपलब्ध है। यहां घने जंगल, पहाड़ियां, छोटी-बड़ी नदियां, प्राकृतिक जल स्रोत और शांत वातावरण उन्हें सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं। जंगल की जैव विविधता पक्षियों को भोजन, घोंसले बनाने के लिए स्थान और प्रजनन का अनुकूल वातावरण देती है।
यही कारण है कि वर्ष के अलग-अलग मौसमों में यहां अनेक प्रजातियों के पक्षी आसानी से देखे जा सकते हैं।
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1. भारतीय मोर (Indian Peafowl)
भारतीय मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है और अचानकमार के जंगलों में बड़ी संख्या में पाया जाता है।
बरसात के मौसम में जब मोर अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नृत्य करता है तो यह दृश्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
वैज्ञानिक नाम: Pavo cristatus
भोजन: बीज, फल, कीट और छोटे जीव।
विशेषता: बारिश से पहले नृत्य करना इसकी पहचान है।
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2. ग्रेट हॉर्नबिल (Great Hornbill)
अचानकमार का सबसे आकर्षक पक्षी ग्रेट हॉर्नबिल माना जाता है। इसकी बड़ी पीली चोंच और सिर के ऊपर हेलमेट जैसी संरचना इसे बेहद अलग पहचान देती है।
यह मुख्य रूप से बड़े वृक्षों वाले जंगलों में पाया जाता है और बीज फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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3. क्रेस्टेड सर्प ईगल (Crested Serpent Eagle)
यह शिकारी पक्षी अपनी तेज नजर और ऊंची उड़ान के लिए प्रसिद्ध है।
इसका मुख्य भोजन सांप, छिपकलियां और छोटे जीव होते हैं।
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4. किंगफिशर (Kingfisher)
अचानकमार की नदियों और तालाबों के किनारे नीले और नारंगी रंग का किंगफिशर अक्सर दिखाई देता है।
यह पानी में गोता लगाकर मछलियों का शिकार करता है।
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5. कठफोड़वा (Woodpecker)
घने जंगलों में पेड़ों के तनों पर लगातार चोंच मारने की आवाज़ सुनाई दे तो समझिए आसपास कठफोड़वा मौजूद है।
यह पेड़ों की छाल के भीतर छिपे कीड़ों को निकालकर खाता है।
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6. ड्रोंगो (Drongo)
ड्रोंगो अपनी बहादुरी और नकल करने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है।
यह बड़े शिकारी पक्षियों को भी परेशान कर अपने क्षेत्र की रक्षा करता है।
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7. बुलबुल (Bulbul)
सुबह के समय बुलबुल की मधुर आवाज़ पूरे जंगल को संगीत से भर देती है।
यह फल, फूलों का रस और छोटे कीट खाती है।
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8. तोता (Parakeet)
हरे रंग के तोते अचानकमार के साल और सागौन के पेड़ों पर झुंड में दिखाई देते हैं।
इनकी तेज आवाज़ जंगल में दूर तक सुनाई देती है।
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9. उल्लू (Owl)
रात के समय सक्रिय रहने वाला उल्लू जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह चूहों और छोटे जीवों की संख्या नियंत्रित करता है।
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10. प्रवासी पक्षी
सर्दियों के मौसम में कुछ प्रवासी पक्षी भी अचानकमार पहुंचते हैं। ये हजारों किलोमीटर की यात्रा कर यहां के जल स्रोतों और सुरक्षित वातावरण में समय बिताते हैं।
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पक्षियों की सुरक्षा क्यों जरूरी है?
पक्षी केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- बीजों का प्रसार करते हैं।
- कीटों की संख्या नियंत्रित करते हैं।
- जंगल के स्वास्थ्य के संकेतक माने जाते हैं।
- परागण में भी योगदान देते हैं।
यदि पक्षियों की संख्या घटती है तो इसका असर पूरे जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
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संरक्षण के प्रयास
अचानकमार टाइगर रिजर्व में पक्षियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए नियमित गश्त, जंगल की निगरानी, आग से बचाव और अवैध शिकार रोकने के प्रयास किए जाते हैं। स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी संरक्षण कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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बर्ड वॉचिंग का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च का समय पक्षी प्रेमियों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। सुबह सूर्योदय के बाद और शाम को सूर्यास्त से पहले पक्षियों की गतिविधियां सबसे अधिक दिखाई देती हैं।
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पर्यटकों के लिए सुझाव
- पक्षियों को डराने के लिए तेज आवाज़ न करें।
- घोंसलों के पास न जाएं।
- प्लास्टिक और कचरा जंगल में न छोड़ें।
- दूरबीन और कैमरे का उपयोग करें।
- वन विभाग के नियमों का पालन करें।
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रोचक तथ्य
- अचानकमार में 150 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं।
- हॉर्नबिल को जंगल का "माली" कहा जाता है क्योंकि यह बीजों को दूर-दूर तक फैलाता है।
- भारतीय मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।
- ड्रोंगो कई पक्षियों की आवाज़ की नकल कर सकता है।
- उल्लू रात में भी बेहद सटीक तरीके से शिकार कर सकता है।
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निष्कर्ष
अचानकमार टाइगर रिजर्व केवल बाघों का घर नहीं, बल्कि पक्षियों की अनमोल दुनिया भी है। यहां का हर पेड़, हर नदी और हर जंगल का हिस्सा किसी न किसी पक्षी का आश्रय है। यदि हम इन पक्षियों और उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत जैव विविधता का आनंद ले सकेंगी। प्रकृति संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी का साझा दायित्व है।
(अगले भाग में पढ़िए: "अचानकमार के 20 सबसे दुर्लभ वन्यजीव – जिन्हें देखना किसी सौभाग्य से कम नहीं")
अचानकमार टाइगर रिजर्व : इतिहास, प्रकृति और संरक्षण का अद्भुत सफर (भाग–1)
अचानकमार टाइगर रिजर्व : छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक धरोहर
छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, घने जंगलों और जैव विविधता के लिए पूरे देश में जाना जाता है। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में सबसे महत्वपूर्ण नाम है अचानकमार टाइगर रिजर्व। यह केवल बाघों का निवास स्थान नहीं, बल्कि हजारों प्रकार के वनस्पतियों, पक्षियों, स्तनधारियों, सरीसृपों और आदिवासी संस्कृति का जीवंत संसार है। मध्य भारत के घने साल के जंगलों के बीच स्थित यह क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों, वन्यजीव शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
आज अचानकमार टाइगर रिजर्व देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में गिना जाता है। यहां प्रकृति संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन इस स्थान का इतिहास केवल आधुनिक संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसका अतीत सदियों पुराना है, जब यह क्षेत्र घने जंगलों और वनवासी समुदायों के जीवन का आधार हुआ करता था।
अचानकमार नाम कैसे पड़ा?
"अचानकमार" नाम को लेकर कई स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं। सबसे अधिक प्रचलित मान्यता यह है कि बहुत पहले इस क्षेत्र में एक वन अधिकारी पर बाघ ने अचानक हमला कर दिया था। इस घटना के बाद लोगों ने इस स्थान को "अचानकमार" कहना शुरू कर दिया। समय के साथ यही नाम पूरे जंगल और बाद में अभयारण्य की पहचान बन गया।
हालांकि इतिहासकारों का मानना है कि इस नाम की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न स्थानीय कथाएं मौजूद हैं और किसी एक कथा को अंतिम ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता। फिर भी यह नाम आज पूरे देश में वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक बन चुका है।
भौगोलिक स्थिति
अचानकमार टाइगर रिजर्व छत्तीसगढ़ के मुंगेली और बिलासपुर जिलों में फैला हुआ है। इसका बड़ा भाग मैकल पर्वत श्रृंखला के घने जंगलों में स्थित है। यह क्षेत्र मध्य प्रदेश की सीमा से भी जुड़ा हुआ है और आगे चलकर कान्हा के जंगलों से पारिस्थितिक रूप से संबंध रखता है।
समुद्र तल से लगभग 300 मीटर से लेकर 1100 मीटर तक की ऊंचाई वाले इस क्षेत्र में पहाड़, घाटियां, छोटी-बड़ी नदियां, झरने और घने साल के जंगल इसकी प्राकृतिक सुंदरता को अद्भुत बनाते हैं।
जंगलों का प्राचीन इतिहास
हजारों वर्षों से यह क्षेत्र प्राकृतिक वन संपदा से समृद्ध रहा है। पुरातात्विक और ऐतिहासिक संकेत बताते हैं कि इस क्षेत्र में आदिवासी समुदाय लंबे समय से निवास करते आए हैं। बैगा, गोंड और अन्य जनजातियां जंगलों के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन बिताती रही हैं।
इन समुदायों के लिए जंगल केवल लकड़ी या ईंधन का स्रोत नहीं था, बल्कि भोजन, औषधि, जल, संस्कृति और आस्था का केंद्र था। पेड़-पौधों, नदियों और वन्यजीवों को वे प्रकृति का परिवार मानते थे।
ब्रिटिश काल और वन प्रबंधन
ब्रिटिश शासन के दौरान मध्य भारत के घने जंगलों का आर्थिक महत्व बढ़ गया। रेलवे के विस्तार और निर्माण कार्यों के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता थी। इसी कारण जंगलों का वैज्ञानिक प्रबंधन शुरू किया गया।
साल, सागौन और अन्य बहुमूल्य वृक्षों की पहचान की गई। वन विभाग की प्रारंभिक व्यवस्था विकसित हुई। हालांकि इस दौरान कई स्थानों पर अंधाधुंध कटाई भी हुई, जिससे प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हुआ।
धीरे-धीरे यह समझ विकसित हुई कि यदि जंगलों का संरक्षण नहीं किया गया तो वन्यजीवों और पर्यावरण दोनों को गंभीर नुकसान होगा।
स्वतंत्रता के बाद संरक्षण की दिशा
1947 में देश स्वतंत्र होने के बाद भारत सरकार ने वन संरक्षण पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। धीरे-धीरे विभिन्न राज्यों में वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना की गई।
अचानकमार क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को देखते हुए इसे विशेष संरक्षण देने की आवश्यकता महसूस हुई। यहां बाघ, तेंदुआ, गौर, भालू, सांभर, चीतल और अनेक दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती थीं। यही कारण था कि इसे संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना
सन् 1975 में अचानकमार को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया। इसका उद्देश्य तेजी से घटती वन्यजीव आबादी की रक्षा करना और जंगलों को सुरक्षित रखना था।
इसके बाद शिकार पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। वन सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई। वनकर्मियों की संख्या बढ़ाई गई और जंगलों की नियमित निगरानी शुरू हुई।
यहीं से अचानकमार के आधुनिक संरक्षण की वास्तविक यात्रा शुरू हुई।
जैव विविधता का खजाना
अचानकमार केवल बाघों के कारण प्रसिद्ध नहीं है। यहां सैकड़ों प्रकार के वृक्ष, औषधीय पौधे, पक्षी, तितलियां और अन्य जीव पाए जाते हैं।
घने साल के जंगल इस क्षेत्र की पहचान हैं। इनके अलावा साजा, बीजा, धावड़ा, तेंदू, महुआ, हर्रा, बहेरा, आंवला, अर्जुन, बांस और अनेक स्थानीय प्रजातियां यहां प्राकृतिक रूप से विकसित होती हैं।
यही वनस्पति यहां रहने वाले वन्यजीवों के लिए भोजन और आश्रय का प्रमुख आधार है।
नदियां और जल स्रोत
अचानकमार क्षेत्र अनेक छोटी-बड़ी नदियों और जलधाराओं का उद्गम स्थल माना जाता है। वर्षा के मौसम में यहां के झरने और पहाड़ी नाले पूरे जंगल को जीवन प्रदान करते हैं।
इन्हीं जल स्रोतों के कारण गर्मियों में भी वन्यजीवों को पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता है, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है।
अचानकमार टाइगर रिजर्व का इतिहास केवल एक जंगल की कहानी नहीं है, बल्कि प्रकृति, वन्यजीवों और मानव के सह-अस्तित्व का प्रेरणादायक उदाहरण है। सदियों पुराने जंगलों से लेकर आधुनिक संरक्षण तक इसकी यात्रा भारत की पर्यावरणीय सोच को भी दर्शाती है।
अगले भाग में पढ़िए: प्रोजेक्ट टाइगर, बाघों का इतिहास, यूनेस्को बायोस्फीयर रिजर्व, वन्यजीव, पर्यटन, सफारी, आदिवासी जीवन और अचानकमार का वर्तमान स्वरूप.....
इतिहास, आधुनिक तकनीक और उपलब्धियों का संगम बना बिलासपुर जंक्शन, भारतीय रेलवे के सबसे अहम स्टेशनों में शुमार............
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ का बिलासपुर जंक्शन भारतीय रेलवे के सबसे महत्वपूर्ण रेल स्टेशनों में गिना जाता है। इसका इतिहास 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1889 में तत्कालीन नागपुर–छत्तीसगढ़ रेलवे की राजनांदगांव से बिलासपुर रेल लाइन शुरू होने के साथ इस स्टेशन का अस्तित्व सामने आया। बाद में इस रेलवे का संचालन बंगाल नागपुर रेलवे ने संभाला। वर्ष 1890 में स्टेशन भवन का निर्माण किया गया और 1891 में नागपुर–आसनसोल मुख्य रेलमार्ग शुरू होने के बाद बिलासपुर की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई। वर्ष 1900 में यह स्टेशन हावड़ा–नागपुर–मुंबई मुख्य रेलमार्ग का प्रमुख जंक्शन बन गया, जिसने देश के पूर्व, मध्य और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समय के साथ बिलासपुर जंक्शन ने आधुनिक रेलवे अवसंरचना की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति की। रेलवे ने चरणबद्ध तरीके से विभिन्न रेलखंडों का विद्युतीकरण किया। राउरकेला–बिलासपुर रेलखंड का विद्युतीकरण वर्ष 1969–70 में, बिलासपुर–नागपुर रेलखंड का वर्ष 1976–77 में तथा बिलासपुर–कटनी रेलखंड का वर्ष 1981 में पूरा हुआ। इन परियोजनाओं ने माल और यात्री ट्रेनों के संचालन को अधिक तेज, सुरक्षित और ऊर्जा दक्ष बनाया, जिससे पूरे दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे नेटवर्क को नई गति मिली।
बिलासपुर की पहचान केवल एक व्यस्त रेलवे स्टेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे बड़े विद्युत इंजन केंद्रों में भी शामिल हो चुका है। वर्ष 2018 में बिलासपुर इलेक्ट्रिक लोको शेड का शुभारंभ किया गया। फरवरी 2026 तक यहां कुल 264 विद्युत इंजन संचालित थे, जिनमें 236 शक्तिशाली WAG-9 मालगाड़ी इंजन और 28 अत्याधुनिक 12,000 हॉर्सपावर क्षमता वाले EF12K इंजन शामिल हैं। यह लोको शेड दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की माल परिवहन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय रेलवे की परिचालन व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहा है।
यात्री सुविधाओं और रेल परिचालन की दृष्टि से भी बिलासपुर जंक्शन देश के सबसे व्यस्त स्टेशनों में शामिल है। भारतीय रेलवे के शीर्ष 100 टिकट बुकिंग स्टेशनों में इसकी गणना होती है। प्रतिदिन लगभग 340 यात्री और मालगाड़ियां इस स्टेशन से होकर गुजरती हैं। यहां से बिलासपुर राजधानी एक्सप्रेस, कलिंगा उत्कल एक्सप्रेस, आजाद हिंद एक्सप्रेस, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस, छत्तीसगढ़ संपर्क क्रांति सुपरफास्ट, ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस, हावड़ा–मुंबई मेल, बिलासपुर–चेन्नई सुपरफास्ट, एर्नाकुलम–बिलासपुर एक्सप्रेस, तिरुनेलवेली–बिलासपुर एक्सप्रेस तथा बिलासपुर–नागपुर वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी कई महत्वपूर्ण ट्रेनें संचालित होती हैं, जो देश के प्रमुख शहरों को बिलासपुर से जोड़ती हैं।
बिलासपुर जंक्शन ने स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। वर्ष 2015–16 के रेलवे स्वच्छता सर्वेक्षण में इसे भारत का तीसरा सबसे स्वच्छ रेलवे स्टेशन तथा सभी जोनल मुख्यालय स्टेशनों में सबसे स्वच्छ स्टेशन का सम्मान प्राप्त हुआ। इसके अलावा यहां स्थित रेलवे प्लेटफॉर्म देश के सबसे लंबे प्लेटफॉर्मों में से एक है, जो बड़े पैमाने पर यात्री और रेल संचालन को सुचारु रूप से संभालने में सक्षम है।
इतिहास, आधुनिक तकनीक, विशाल रेल नेटवर्क, अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक लोको शेड, उत्कृष्ट स्वच्छता और देशव्यापी रेल संपर्क जैसी अनेक विशेषताओं के कारण बिलासपुर जंक्शन भारतीय रेलवे का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय होने के कारण यह स्टेशन न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश की रेल व्यवस्था में रणनीतिक भूमिका निभा रहा है। लगातार बढ़ते यात्री भार, आधुनिक सुविधाओं के विस्तार और नई तकनीकों के समावेश के साथ बिलासपुर जंक्शन भविष्य में भी भारतीय रेलवे के प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण रेल केंद्रों में अपनी पहचान बनाए रखने की दिशा में अग्रसर है।
बिलासपुर :–भारतीय रेलवे अब सुरक्षा के उस नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां मानवीय भूल से होने वाली रेल दुर्घटनाओं पर अत्याधुनिक तकनीक के जरिए प्रभावी रोक लगाई जाएगी। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे अपने पूरे 2430 रूट किलोमीटर नेटवर्क पर स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम 'कवच' को लागू करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। रेलवे संचार व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई जा रही है, आधुनिक संचार टावर स्थापित किए जा रहे हैं और लोकोमोटिवों में कवच उपकरण फिट किए जा रहे हैं। अब तक 238 इंजनों में यह प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। यह परियोजना केवल तकनीकी उन्नयन नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे के सुरक्षा इतिहास में एक बड़ा बदलाव मानी जा रही है, जिससे लाखों यात्रियों का सफर पहले से कहीं अधिक सुरक्षित, भरोसेमंद और आधुनिक होगा।
बिलासपुर मंडल में बिलासपुर–रायगढ़ रेलखंड पर कवच की कमीशनिंग का कार्य तेजी से चल रहा है, जबकि बिलासपुर–चांपा रेलखंड में फील्ड परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं। नागपुर मंडल के नागपुर–दुर्ग रेलखंड पर एसआईएल-4 स्तर की कमीशनिंग के लिए साइट परीक्षण और लोको ट्रायल जारी हैं। इसी क्रम में 23 जुलाई को कलमना–सालवा (25 किलोमीटर) रेलखंड पर ब्रेकिंग मोड ऑन के साथ एसआईएल-4 स्तर का कवच ट्रायल पूरी तरह सफल रहा। इस परीक्षण के दौरान सिग्नल रिस्पॉन्स, स्वचालित ब्रेकिंग, गति नियंत्रण और आपातकालीन एसओएस प्रणाली की कार्यक्षमता को परखा गया, जिसमें सभी परीक्षण सफल रहे। वहीं रायपुर मंडल के दुर्ग–मांढर रेलखंड पर भी परियोजना निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार तेजी से आगे बढ़ रही है।
'कवच' भारतीय रेल के अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) द्वारा विकसित विश्वस्तरीय एसआईएल-4 प्रमाणित स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली है। यह तकनीक लोको पायलट को वास्तविक समय में सिग्नल की स्थिति, अधिकतम अनुमत गति, लक्ष्य दूरी और मूवमेंट अथॉरिटी जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराती है। यदि चालक किसी कारणवश निर्धारित गति सीमा का पालन नहीं करता या खतरे वाले सिग्नल को पार करने की स्थिति बनती है, तो कवच बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वतः ब्रेक लगाकर ट्रेन को सुरक्षित रोक देता है। यही वजह है कि इसे भारतीय रेलवे की सबसे भरोसेमंद और भविष्य की सुरक्षा तकनीकों में शामिल किया जा रहा है।
इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल सिग्नल उल्लंघन ही नहीं रोकती, बल्कि आमने-सामने, पीछे से या साइड से होने वाली संभावित ट्रेन टक्कर को भी रोकने में सक्षम है। घने कोहरे या कम दृश्यता जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी यह सुरक्षित ट्रेन संचालन सुनिश्चित करती है। खतरे वाले सिग्नल को पार करने से पहले ट्रेन को स्वतः रोकना, निर्धारित गति सीमा से अधिक होने पर स्वचालित ब्रेक लगाना, स्थायी एवं अस्थायी गति प्रतिबंधों का पालन कराना, लेवल क्रॉसिंग के निकट स्वतः हॉर्न बजाना और किसी आपात स्थिति में स्टॉप ऑन साइट (एसओएस) संदेश प्रसारित कर आसपास की ट्रेनों को स्वतः नियंत्रित करना इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। इससे रेल परिचालन न केवल अधिक सुरक्षित होगा, बल्कि समयबद्धता और संचालन क्षमता में भी उल्लेखनीय सुधार आएगा.....
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में चरणबद्ध तरीके से 'कवच' के विस्तार के साथ भारतीय रेलवे आत्मनिर्भर तकनीक के बल पर सुरक्षा का नया अध्याय लिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जब पूरा 2430 रूट किलोमीटर नेटवर्क इस अत्याधुनिक प्रणाली से जुड़ जाएगा, तब रेल दुर्घटनाओं की आशंका में भारी कमी आएगी और यात्रियों का भरोसा पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा। स्वदेशी तकनीक पर आधारित यह सुरक्षा कवच केवल रेलवे की उपलब्धि नहीं, बल्कि देश की तकनीकी क्षमता, आत्मनिर्भरता और सुरक्षित भविष्य की मजबूत पहचान बनकर उभर रहा है...........
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना: किसानों को हर साल मिलती है आर्थिक सहायता, जानिए आवेदन की पूरी प्रक्रिया
देश के करोड़ों किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता तीन समान किस्तों में सीधे उनके बैंक खाते में भेजी जाती है। इस राशि का उपयोग किसान बीज, खाद, कृषि उपकरण और अन्य आवश्यक कृषि कार्यों में कर सकते हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य खेती की लागत का कुछ हिस्सा कम करने और छोटे एवं सीमांत किसानों को समय पर आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराना है।
इस योजना का लाभ लेने के लिए किसान के पास कृषि योग्य भूमि का रिकॉर्ड होना चाहिए तथा आधार कार्ड, बैंक खाता और मोबाइल नंबर जैसी आवश्यक जानकारी सही होना जरूरी है। आवेदन ऑनलाइन या संबंधित कृषि विभाग, कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) अथवा स्थानीय प्रशासन की सहायता से किया जा सकता है। आवेदन के बाद संबंधित विभाग दस्तावेजों का सत्यापन करता है और पात्र पाए जाने पर किसान का नाम लाभार्थी सूची में शामिल किया जाता है।
किसानों को समय-समय पर यह भी जांचते रहना चाहिए कि उनके आधार और बैंक खाते की जानकारी सही है या नहीं। यदि किसी जानकारी में त्रुटि होती है तो किस्त आने में परेशानी हो सकती है। सरकार समय-समय पर लाभार्थी सूची का सत्यापन भी करती है ताकि केवल पात्र किसानों को ही योजना का लाभ मिले।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी योजना का लाभ लेने से पहले उसकी आधिकारिक जानकारी अवश्य पढ़नी चाहिए। गलत जानकारी या फर्जी वेबसाइटों से बचना चाहिए और आवेदन केवल अधिकृत माध्यम से ही करना चाहिए। यदि किसी किसान को आवेदन या किस्त से संबंधित समस्या आती है तो वह संबंधित कृषि विभाग या अधिकृत सहायता केंद्र से संपर्क कर सकता है।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना किसानों को आर्थिक सहयोग देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। पात्र किसान समय पर आवेदन और दस्तावेजों का सत्यापन कराकर इस योजना का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
बिलासपुर का इतिहास: विरासत, संस्कृति और विकास की अनोखी गाथा
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी के रूप में पहचान बना चुका बिलासपुर केवल एक आधुनिक शहर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का जीवंत उदाहरण भी है। अरपा नदी के शांत तट पर बसा यह शहर आज न्यायपालिका, रेलवे, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार का प्रमुख केंद्र है। लेकिन बिलासपुर की पहचान केवल वर्तमान विकास तक सीमित नहीं है। इसका इतिहास हमें उन दिनों में ले जाता है, जब यह क्षेत्र दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक परंपराओं, कलचुरी शासकों की राजधानी और व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था।
आज देशभर में बिलासपुर को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के मुख्यालय के रूप में जाना जाता है। वहीं स्थानीय लोककथाओं में यह शहर वीरांगना बिलासा केंवटीन के साहस और संघर्ष की याद दिलाता है। यही कारण है कि इतिहास, संस्कृति और आधुनिक विकास का अनूठा संगम बिलासपुर
को छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में स्थान दिलाता है।
बिलासपुर नाम की उत्पत्ति
बिलासपुर के नाम को लेकर कई मान्यताएँ प्रचलित हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध मान्यता वीरांगना बिलासा केंवटीन से जुड़ी है। लोककथाओं के अनुसार बिलासा एक साहसी, निडर और समाजसेवी महिला थीं, जिन्होंने अपने साहस और नेतृत्व से लोगों का विश्वास जीता। उनके सम्मान में इस क्षेत्र का नाम "बिलासपुर" पड़ा।
आज भी छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, गीतों और कथाओं में बिलासा केंवटीन का विशेष स्थान है। राज्य सरकार भी उनके सम्मान में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बिलासपुर का इतिहास केवल इमारतों और राजाओं का नहीं, बल्कि जननायकों और लोकपरंपराओं का भी इतिहास है।
प्राचीन काल का बिलासपुर
प्राचीन समय में बिलासपुर का क्षेत्र दक्षिण कोसल का हिस्सा माना जाता था। यह क्षेत्र धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था। आसपास के रतनपुर, मल्हार और सिरपुर जैसे नगर उस समय शिक्षा, धर्म और कला के प्रमुख केंद्र थे।
विशेष रूप से मल्हार का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। यहाँ हुई पुरातात्विक खुदाइयों में कई प्राचीन मंदिर, मूर्तियाँ, सिक्के और शिलालेख मिले हैं, जो बताते हैं कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों से सभ्यता का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
इतिहासकारों के अनुसार इस क्षेत्र में बौद्ध, जैन और सनातन धर्म की परंपराएँ साथ-साथ विकसित हुईं। यही विविधता आज भी बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान में दिखाई देती है।
कलचुरी शासन और रतनपुर का गौरव
बिलासपुर के इतिहास में कलचुरी वंश का विशेष महत्व है। लगभग 10वीं शताब्दी से रतनपुर कलचुरी राजाओं की राजधानी बना। उस समय पूरा क्षेत्र प्रशासन, व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था।
कलचुरी शासकों ने अनेक मंदिरों, तालाबों और धार्मिक स्थलों का निर्माण कराया। आज भी रतनपुर का महामाया मंदिर, प्राचीन किले के अवशेष और अन्य ऐतिहासिक धरोहरें उस गौरवशाली काल की याद दिलाती हैं।
उस समय कृषि और व्यापार दोनों तेजी से विकसित हुए। आसपास के गाँवों से अनाज, वन उत्पाद और हस्तशिल्प रतनपुर के बाजारों तक पहुँचते थे। इससे पूरे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई।
अरपा नदी का महत्व
बिलासपुर का विकास अरपा नदी के बिना अधूरा है। यह नदी केवल पानी का स्रोत नहीं रही, बल्कि शहर की संस्कृति, कृषि और व्यापार की आधारशिला भी बनी।
नदी के किनारे बसे गाँवों में खेती तेजी से विकसित हुई। लोगों को पीने का पानी, सिंचाई और आवागमन की सुविधा मिली। धीरे-धीरे नदी के आसपास बस्तियाँ विकसित हुईं, जो आगे चलकर आधुनिक बिलासपुर शहर का हिस्सा बन गईं।
आज भी अरपा नदी को बिलासपुर की जीवनरेखा कहा जाता है। हालांकि बढ़ते शहरीकरण के कारण इसके संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
मराठा शासन का दौर
18वीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर मराठाओं का प्रभाव बढ़ा। मराठा शासन के दौरान राजस्व व्यवस्था में कई बदलाव किए गए। व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला और प्रशासनिक व्यवस्था को संगठित किया गया।
इसी काल में बिलासपुर का महत्व धीरे-धीरे बढ़ने लगा। आसपास के क्षेत्रों से व्यापारी यहाँ आने लगे और स्थानीय बाजारों का विस्तार हुआ। कृषि उत्पादों के साथ-साथ वन संपदा का व्यापार भी बढ़ा।
मराठा काल ने बिलासपुर को एक उभरते हुए व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचान दिलाई, जिसने आगे चलकर आधुनिक शहर बनने की नींव रखी।
अंग्रेजी शासन और आधुनिक प्रशासन की शुरुआत
1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद यह क्षेत्र अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। अंग्रेजी शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था को नया स्वरूप दिया गया। वर्ष 1861 में बिलासपुर को जिला बनाया गया और कुछ वर्षों बाद नगर पालिका की स्थापना हुई।
अंग्रेजों ने सड़क, राजस्व व्यवस्था और सरकारी कार्यालयों के विकास पर ध्यान दिया। इससे शहर में नई प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हुई और जनसंख्या भी बढ़ने लगी।
इसी दौर ने आधुनिक बिलासपुर की नींव रखी, जिसका प्रभाव आज भी शहर की संरचना और प्रशासन में दिखाई देता है।
अनुकंपा नियुक्ति वंशानुगत अधिकार नहीं, 16 साल बाद दायर याचिका खारिज; बिलासपुर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
बिलासपुर – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति किसी कर्मचारी के परिवार का खानदानी या वंशानुगत अधिकार नहीं, बल्कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उत्पन्न तत्काल आर्थिक संकट से परिवार को राहत देने की एक विशेष व्यवस्था है। न्यायालय ने एक शासकीय कर्मचारी की बेटी द्वारा पिता के निधन के करीब 16 वर्ष बाद दायर अनुकंपा नियुक्ति की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इतने लंबे समय बाद इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य स्वतः समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति केवल
सहानुभूति के आधार पर नहीं दी जा सकती और इसके लिए निर्धारित नियमों एवं समय-सीमा का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों से हटकर किसी को नियुक्ति देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर माना जा रहा है, जिससे स्पष्ट संदेश गया है कि इस व्यवस्था का लाभ केवल वास्तविक और तत्काल आर्थिक आवश्यकता की स्थिति में ही दिया जा सकता है, न कि वर्षों बाद इसे अधिकार के रूप में दावा किया जा सकता है।
दिल्ली –जंतर-मंतर हिंसा: अचानक भड़का प्रदर्शन या पहले से रची गई साजिश? दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आ रहे चौंकाने वाले पहलू
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर हुई हिंसा की गूंज अब भी थमी नहीं है। घटना को करीब दो सप्ताह बीत चुके हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी बरकरार है—क्या यह प्रदर्शन अचानक बेकाबू हुई भीड़ का परिणाम था या इसके पीछे पहले से रची गई कोई सुनियोजित साजिश थी? इसी सवाल का जवाब तलाशने में दिल्ली पुलिस और जांच एजेंसियां दिन-रात जुटी हुई हैं। पुलिस अब इस पूरे घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था भंग होने की घटना नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक साजिश के एंगल से भी जांच रही है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (एफआरएस), सोशल मीडिया गतिविधियां, डिजिटल फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जोड़कर घटना की एक-एक कड़ी खंगाली जा रही है। पुलिस का दावा है कि फेस रिकॉग्निशन सिस्टम के जरिए अब तक 2,873 लोगों की पहचान की गई है, जिनमें 989 लोगों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड होने की बात कही गई है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच जारी है। घटना वाले दिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के बाद भीड़ ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, जबकि उस समय मानसून सत्र चल रहा था और क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू थी। सुरक्षा के लिए कई स्तर की बैरिकेडिंग की गई थी, लेकिन पुलिस के अनुसार कुछ लोगों ने बैरिकेड हटाने का प्रयास किया, जिसके बाद तनाव तेजी से हिंसा में बदल
गया। पुलिस का आरोप है कि उस दौरान पथराव हुआ, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, बैरिकेड तोड़े गए और वाहनों में तोड़फोड़ की गई। हालात काबू से बाहर होने पर पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और रैपिड एक्शन फोर्स की मदद से भीड़ को तितर-बितर किया। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक कुछ प्रदर्शनकारी संसद भवन के प्रवेश क्षेत्र के बेहद करीब तक पहुंच गए थे, जिसके बाद संसद परिसर में तैनात सीआईएसएफ जवानों को हाई अलर्ट पर रखा गया। पुलिस के अनुसार 21 से 25 जुलाई के बीच भी राजधानी के अलग-अलग इलाकों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए, जिनमें कई वरिष्ठ अधिकारी समेत लगभग 250 पुलिसकर्मी घायल हुए। सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचा, जिसमें 100 से अधिक बैरिकेड, सैकड़ों बॉडी प्रोटेक्टर, हेलमेट, दंगा-रोधी शील्ड, लाउड हेलर और कई सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त होने की बात कही गई है। पूरे मामले में 20 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं और दंगा, सरकारी संपत्ति को नुकसान, हत्या के प्रयास, पुलिस पर हमला, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने के प्रयास तथा आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराओं के तहत जांच आगे बढ़ रही है। पुलिस उन लोगों की भी पहचान करने की कोशिश कर रही है जो मास्क और सुरक्षात्मक उपकरण पहनकर आए थे, जबकि करीब 400 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनलों, मोबाइल चैट तथा डिजिटल डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है। जांच एजेंसियां कुछ राजनीतिक संगठनों और अन्य समूहों की संभावित भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं, लेकिन अब तक किसी संगठन या व्यक्ति की भूमिका पर कोई आधिकारिक निष्कर्ष घोषित नहीं किया गया है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं और उनका जवाब जांच पूरी होने तथा अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएगा। तब तक यह मामला केवल एक हिंसक प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश की राजधानी की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और संभावित साजिश की परतों को खोलने वाली सबसे चर्चित जांचों में से एक बना हुआ है।
दो साल बाद जेल में बंद विचाराधीन कैदी की मौत मामले में हत्या का केस दर्ज, अज्ञात आरोपी के खिलाफ FIR
श्रवण सूर्यवंशी की संदिग्ध मौत की जांच ने लिया नया मोड़, सिर पर गंभीर चोट के बाद पुलिस ने शुरू की हत्या की विवेचना
बिलासपुर केंद्रीय जेल में विचाराधीन बंदी श्रवण सूर्यवंशी उर्फ श्रवण ताम्रे की मौत के मामले में करीब दो वर्ष बाद बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। न्यायिक जांच रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश के आधार पर सिविल लाइन थाना पुलिस ने अज्ञात आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की लागू समकक्ष धारा के अनुरूप हत्या का मामला दर्ज कर विस्तृत विवेचना शुरू कर दी है। इस कार्रवाई के साथ ही लंबे समय से चर्चा में रहे कस्टोडियल डेथ मामले की जांच अब नए चरण में पहुंच गई है।
मिली जानकारी के अनुसार ग्राम मोहरा, थाना सीपत निवासी 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी अधिनियम के एक मामले में गिरफ्तार कर जनवरी 2024 में बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा गया था। 21 जनवरी को जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई थी। प्रारंभिक तौर पर मर्ग कायम कर जांच शुरू की गई, लेकिन न्यायिक जांच के दौरान पोस्टमार्टम, एफएसएल, हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट, वीडियोग्राफी, पंचनामा और गवाहों के बयान सहित सभी साक्ष्यों की समीक्षा में सामने आया कि मृत्यु सिर में लगी गंभीर चोट और उससे उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। चिकित्सकीय रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि चोट किसी कठोर एवं भोथरी वस्तु से लगना संभव है, जबकि रासायनिक परीक्षण में किसी प्रकार का विष नहीं मिला।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की जांच रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपे जाने के बाद मामले का परीक्षण किया गया। मृतक के परिजनों ने जांच के दौरान किसी व्यक्ति पर प्रत्यक्ष संदेह तो व्यक्त नहीं किया, लेकिन गिरफ्तारी के बाद जेल में हुई मौत को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उपलब्ध साक्ष्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर 30 जुलाई 2026 को अज्ञात आरोपी के विरुद्ध हत्या का अपराध दर्ज किया गया। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि श्रवण के सिर पर घातक चोट किन परिस्थितियों में लगी, इसके पीछे कौन जिम्मेदार था और क्या यह जेल के भीतर हुई आपराधिक घटना थी। मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्यों के सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
बिलासपुर सेंट्रल जेल में कैदी की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, DGP और गृह सचिव 4 अगस्त को होंगे तलब
एक लाख मुआवजे को सुप्रीम कोर्ट ने माना नाकाफी, कस्टोडियल डेथ में FIR और आपराधिक जांच पर मांगा जवाब
बिलासपुर स्थित केंद्रीय जेल में विचाराधीन कैदी श्रवण सूर्यवंशी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। मृतक के परिजनों की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को 4 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के निर्देश पर परिजनों को दिए गए एक लाख रुपये के मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि हिरासत में हुई मौत के इस मामले में अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई और आपराधिक जांच की दिशा में क्या ठोस कार्रवाई हुई है। उल्लेखनीय है कि 18 जनवरी 2024 को सीपत थाना पुलिस ने आबकारी अधिनियम के तहत 6 लीटर कच्ची महुआ शराब बरामदगी के आरोप में श्रवण सूर्यवंशी को गिरफ्तार कर बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा था। 21 जनवरी को जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी को उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। बाद में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच में यह सामने आया कि उसकी मौत सिर में लगी गंभीर चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। इसके बाद परिजनों ने दोषी पुलिस एवं जेल अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के हलफनामे पर असंतोष जताते हुए कहा कि उसमें न तो एफआईआर दर्ज न होने का संतोषजनक कारण बताया गया है और न ही आपराधिक जांच की प्रगति का स्पष्ट विवरण दिया गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य के शीर्ष अधिकारियों को अदालत के समक्ष जवाब देना होगा, जिससे कस्टोडियल डेथ के इस बहुचर्चित प्रकरण में आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।
बिलासपुर: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के कथित अपमान के विरोध में बिलासपुर जिला व शहर कांग्रेस कमेटी क...