Friday, July 31, 2026

दो साल बाद जेल में बंद विचाराधीन कैदी की मौत मामले में हत्या का केस दर्ज, अज्ञात आरोपी के खिलाफ FIR




दो साल बाद जेल में बंद विचाराधीन कैदी की मौत मामले में हत्या का केस दर्ज, अज्ञात आरोपी के खिलाफ FIR

श्रवण सूर्यवंशी की संदिग्ध मौत की जांच ने लिया नया मोड़, सिर पर गंभीर चोट के बाद पुलिस ने शुरू की हत्या की विवेचना

बिलासपुर केंद्रीय जेल में विचाराधीन बंदी श्रवण सूर्यवंशी उर्फ श्रवण ताम्रे की मौत के मामले में करीब दो वर्ष बाद बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। न्यायिक जांच रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश के आधार पर सिविल लाइन थाना पुलिस ने अज्ञात आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की लागू समकक्ष धारा के अनुरूप हत्या का मामला दर्ज कर विस्तृत विवेचना शुरू कर दी है। इस कार्रवाई के साथ ही लंबे समय से चर्चा में रहे कस्टोडियल डेथ मामले की जांच अब नए चरण में पहुंच गई है।

मिली जानकारी के अनुसार ग्राम मोहरा, थाना सीपत निवासी 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी अधिनियम के एक मामले में गिरफ्तार कर जनवरी 2024 में बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा गया था। 21 जनवरी को जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई थी। प्रारंभिक तौर पर मर्ग कायम कर जांच शुरू की गई, लेकिन न्यायिक जांच के दौरान पोस्टमार्टम, एफएसएल, हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट, वीडियोग्राफी, पंचनामा और गवाहों के बयान सहित सभी साक्ष्यों की समीक्षा में सामने आया कि मृत्यु सिर में लगी गंभीर चोट और उससे उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। चिकित्सकीय रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि चोट किसी कठोर एवं भोथरी वस्तु से लगना संभव है, जबकि रासायनिक परीक्षण में किसी प्रकार का विष नहीं मिला।


न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की जांच रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश को सौंपे जाने के बाद मामले का परीक्षण किया गया। मृतक के परिजनों ने जांच के दौरान किसी व्यक्ति पर प्रत्यक्ष संदेह तो व्यक्त नहीं किया, लेकिन गिरफ्तारी के बाद जेल में हुई मौत को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उपलब्ध साक्ष्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर 30 जुलाई 2026 को अज्ञात आरोपी के विरुद्ध हत्या का अपराध दर्ज किया गया। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि श्रवण के सिर पर घातक चोट किन परिस्थितियों में लगी, इसके पीछे कौन जिम्मेदार था और क्या यह जेल के भीतर हुई आपराधिक घटना थी। मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ कई महत्वपूर्ण तथ्यों के सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

बिलासपुर सेंट्रल जेल में कैदी की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, DGP और गृह सचिव 4 अगस्त को होंगे तलब

 



बिलासपुर सेंट्रल जेल में कैदी की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, DGP और गृह सचिव 4 अगस्त को होंगे तलब

एक लाख मुआवजे को सुप्रीम कोर्ट ने माना नाकाफी, कस्टोडियल डेथ में FIR और आपराधिक जांच पर मांगा जवाब

बिलासपुर स्थित केंद्रीय जेल में विचाराधीन कैदी श्रवण सूर्यवंशी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। मृतक के परिजनों की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को 4 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के निर्देश पर परिजनों को दिए गए एक लाख रुपये के मुआवजे को अपर्याप्त बताते हुए राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि हिरासत में हुई मौत के इस मामले में अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की गई और आपराधिक जांच की दिशा में क्या ठोस कार्रवाई हुई है। उल्लेखनीय है कि 18 जनवरी 2024 को सीपत थाना पुलिस ने आबकारी अधिनियम के तहत 6 लीटर कच्ची महुआ शराब बरामदगी के आरोप में श्रवण सूर्यवंशी को गिरफ्तार कर बिलासपुर केंद्रीय जेल भेजा था। 21 जनवरी को जेल में उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी को उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। बाद में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के निर्देश पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच में यह सामने आया कि उसकी मौत सिर में लगी गंभीर चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। इसके बाद परिजनों ने दोषी पुलिस एवं जेल अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के हलफनामे पर असंतोष जताते हुए कहा कि उसमें न तो एफआईआर दर्ज न होने का संतोषजनक कारण बताया गया है और न ही आपराधिक जांच की प्रगति का स्पष्ट विवरण दिया गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य के शीर्ष अधिकारियों को अदालत के समक्ष जवाब देना होगा, जिससे कस्टोडियल डेथ के इस बहुचर्चित प्रकरण में आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।

Thursday, July 30, 2026

जिस्म में लोहे सा दम या पैकेटबंद मौत का जहर

 शीर्षक:–जिस्म में लोहे सा दम या पैकेटबंद मौत का जहर


जहाँ आज हमारी आधुनिक और रफ्तार भरी जिंदगी ने हमें सुपरमार्केट की चमकीली पन्नी और फ्रिज के ठंडे जहर का गुलाम बना दिया है, वहीं अगर हम अपने पूर्वजों की उस सोंधी और प्राणवान थाली पर एक सरसरी नजर डालें, तो जमीन आसमान का यह ऐसा खौफनाक और चीरफाड़ करने वाला फर्क साफ दिखाई देता है कि जिसे पढ़कर आज की इस एस्प्रिन और इंसुलिन पर पलने वाली पीढ़ी की रूह काँप जाएगी और रगों में खौलता हुआ लावा दौड़ पड़ेगा। जरा सोचिए, उस दौर की मिसाल जब हमारे बुजुर्ग सुबह-सुबह कोहरे की चादर के बीच उठकर खेतों की उपजाऊ और रसायन-मुक्त मिट्टी से उपजे बाजरे, ज्वार और मक्के की उस सोंधी रोटी को अपने हाथों से मथकर निकाले गए शुद्ध और ताज़े मक्खन व गाढ़े देसी घी के साथ बड़े चाव से खाते थे, जो उनके जिस्म में लोहे जैसी फौलादी ताकत और हड्डियों में पहाड़ जैसा दम भर देता था, जबकि आज का यह कॉर्पोरेट युग में जीने वाला इंसान अपनी 24वीं-25वीं मंजिल के कांच वाले कमरों में बैठकर फैक्ट्रियों में जहरीले हेक्सेन केमिकल और हाई-टेंपरेचर की भट्टियों से पकाए गए उस तथाकथित 'रिफाइंड ऑयल' और मैदे से बनी जानलेवा ब्रेड-नूडल्स को गटक रहा है, जिसने महज तीस साल की उम्र में ही युवाओं को फैटी लिवर, हार्ट अटैक और कम उम्र की डायबिटीज जैसी लाइलाज बीमारियों का लाचार गुलाम बना डाला है। जरा कल्पना कीजिए उस प्राचीन संस्कृति की जहाँ ताँबे के बर्तन और मिट्टी के उस मटके का अमृत तुल्य शीतल जल पिया जाता था जो पेट की हर एक आग को शांत कर आंतरिक शुद्धि देता था, उसके मुकाबले आज का युवा अपनी प्यास बुझाने के लिए उन रंग-बिरंगी बोतलों में भरी कोल्ड ड्रिंक्स और सोडे को गटकता है जिनमें सात-सात चम्मच घुली हुई चीनी सीधे उसके अग्नाशय और हड्डियों को अंदर से दीमक की तरह चाट रही है, और तो और, जब हमारे पुरखों का खान-पान एक पवित्र संस्कार हुआ करता था जहाँ वे परिवार के साथ जमीन पर पालथी मारकर बैठते थे, हर एक कौर को इत्मीनान से 32 बार चबाकर अपनी लार के साथ अमृत बनाकर भीतर उतारते थे ताकि पाचन तंत्र हमेशा वज्र जैसा मजबूत रहे, तो इसके ठीक उलट आज का यह आधुनिक मानव डाइनिंग टेबल या ऑफिस की कुर्सियों पर एक हाथ में मोबाइल की नीली स्क्रीन पर अंतहीन रील्स को स्वाइप करते हुए और दूसरे हाथ में प्रिजर्वेटिव्स से सड़े हुए पैकेटबंद जंक फूड को बिना चबाए ऐसे गटक जाता है जैसे किसी मवेशी को चारा ठूसा जा रहा हो, जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास भले ही स्वाद के नाम पर दुनिया भर के रेस्टोरेंट, महंगे पिज़्ज़ा-बर्गर और लाखों डिग्रियाँ मौजूद हों, लेकिन वह नैसर्गिक ऊर्जा, वह बुलंद हौसला और वह मानसिक सुकून हमेशा के लिए गायब हो चुका है जो कभी हमारे उन बुजुर्गों की थाली की शान हुआ करता था जो बिना किसी डॉक्टर, बिना किसी मेडिक्लेम और बिना किसी अस्पताल की देहरी लाँघे हँसते-खेलते सौ साल की फौलादी जिंदगी जी जाते थे, इसलिए अब भीवक्त है कि इस अंधी और विनाशकारी डिजिटल दौड़ से बाहर निकलकर अपनी जड़ों की उस सोंधी महक को पहचानिए, क्योंकि अगर अब भी नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कोसेगी कि हमने स्वाद के चक्कर में अपनी सेहत, अपनी संस्कृति और अपनी नस्ल दोनों को बाजार के हाथों नीलाम कर दिया।


रील्स की चमक और अपनों की खामोश चीख: क्या हमने फोन को अपना सब कुछ मान लिया है?

शीर्षक: रील्स की चमक और अपनों की खामोश चीख.....क्या हमने फोन को अपना सब कुछ मान लिया है?



शाम की हल्की रोशनी जब ड्राइंग रूम की खिड़की से अंदर आती है, तो अमूमन वहाँ चाय की कपों की खनक, हँसी-मजाक और दिनभर के हाल-चाल गूँजा करते थे। लेकिन आज उस कमरे में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा पसरा रहता है। सन्नाटा इस बात का नहीं कि वहाँ कोई नहीं है—वहाँ पूरा परिवार मौजूद है। माँ एक कोने में बैठी हैं, पिता जी दूसरे कोने में, और बेटा-बेटी अपनी-अपनी दुनिया में गुम हैं। अजीब बात यह है कि कोई किसी से बात नहीं कर रहा, सबके हाथों में स्क्रीन जल रही है, और मोबाइल की नीली रोशनी उनके चेहरों पर एक अजीब सा वीरानपन और कृत्रिम चमक छोड़ रही है।


हम एक ऐसी डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ अपनों से चंद कदम की दूरी पर बैठकर हम उन्हें रील्स भेजते हैं। सोचकर देखिए, यह आधुनिकता का कौन सा भयानक मुकाम है, जहाँ अपनों के जज़्बात, उनकी मुस्कान और उनके आंसुओं से ज्यादा कीमती हमारे लिए कुछ सेकंड के वीडियो पर मिलने वाले 'लाइक्स' और 'व्यूज' हो गए हैं।



(स्क्रीन की चकाचौंध में खोता अपनापन)

याद कीजिए वो दौर जब घरों में संवाद ही सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करता था। लोग एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करते थे, चेहरे के भाव पढ़कर समझ जाते थे कि अंदर क्या तूफान चल रहा है। आज? आज हम स्क्रीन के उस पार बैठे किसी अनजान अजनबी के रोने पर तो दिल (❤️) वाला इमोजी भेज देते हैं, लेकिन अपने ही घर में सुबक रही माँ की आँखों के कोने में जमी नमी हमें नजर नहीं आती।



कल शाम की ही तो बात है। एक बुजुर्ग पिता ने अपने युवा बेटे से कहा, "ेटा, थोड़ी देर फोन रख दे, ज़रा साथ बैठकर बात कर।" बेटे की उंगलियाँ स्क्रीन पर तेज़ी से चल रही थीं, बिना नजर उठाए उसने एक रील का लिंक पिता के व्हाट्सएप पर भेज दिया और बेरुखी से बोला, "पापा, यह वाला देखो, बहुत फनी है, बाद में बात करते हैं।"

उस बूढ़े बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी? उस पिता ने, जिसने अपनी पूरी जवानी उस बेटे की उंगली थामकर उसे चलना सिखाने में बिता दी, आज बुढ़ापे में दो मिनट की तवज्जो के लिए एक वर्चुअल लिंक का मोहताज हो गया। क्या इसी दिन के लिए उसने अपने अरमानों का गला घोंटा था?

(फॉलोअर्स' की भीड़ और अपनों का अकेलापन)

आज हमारी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। इंस्टाग्राम और फेसबुक के 'फॉलुअर्स' हमारी हकीकत बन चुके हैं। हम इस भ्रम में जी रहे हैं कि जितने ज्यादा लोग हमें स्क्रीन पर देख रहे हैं, हम उतने ही लोकप्रिय और खुश हैं। लेकिन यह डिजिटल लोकप्रियता एक छलावा है, एक ऐसा नशा है जो धीरे-धीरे हमें अपनों से काट रहा है।

हम वर्चुअल दुनिया में दूसरों को हँसाने और प्रभावित करने के चक्कर में अपने घर के अंदर के लोगों को रुला रहे हैं। एक पत्नी दिनभर रील्स बनाने की जुगत में लगी रहती है—कौन सा ट्रेंडिंग गाना चल रहा है, किस पर वीडियो बनानी है। पति अपने ऑफिस के तनाव से चूर होकर घर लौटता है, तो उसे सुकून का एक कंधा मिलने के बजाय कैमरे के सामने पोज देने को कहा जाता है। रिश्तों की ऊष्मा अब लाइक और कमेंट के काउंटर पर आकर दम तोड़ रही है।

( जब तक अहसास होगा, बहुत देर हो चुकी होगी  )

तकनीक दुश्मन नहीं है, दुश्मन हमारा अतिरेक है। मोबाइल ने दुनिया को छोटा किया है, लेकिन हमारे घरों के दिलों को बहुत दूर कर दिया है।

हम यह भूल रहे हैं कि जिंदगी कोई रील्स की फीड नहीं है, जिसे स्वाइप करके अगला पन्ना पलटा जा सके। जो लोग आज हमारे पास हैं, जो माँ-बाप हमारे लौटने का इंतजार करते हैं, जो जीवनसाथी हमारी एक मीठी मुस्कान को तरसता है—वे हमेशा के लिए यहाँ नहीं रहने वाले।

एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे पास लाखों फॉलोअर्स होंगे, बैंक खाते में पैसे होंगे, मोबाइल की गैलरी हजारों वीडियो से भरी होगी, लेकिन जब हम मुड़कर देखेंगे तो घर का वह कमरा खाली मिलेगा। तब कोई हमें रील्स भेजने वाला नहीं होगा, कोई हमारी पोस्ट पर लाइक करने वाला नहीं होगा। बस पछतावे के सिवाय हाथ कुछ नहीं लगेगा।


आज इस लेख को पढ़ते-पढ़ते खुद से एक सवाल पूछिए—क्या वाकई हमने अपने अपونों को उस स्क्रीन के हवाले कर दिया है, जिसकी कोई रूह नहीं होती?

वक्त अभी भी पूरी तरह से नहीं फिसला है। आज ही, बल्कि इसी वक्त, अपने हाथ से उस फोन को नीचे रखिए। पास बैठे अपने पिता का हाथ थामिए, अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर पूछिए कि वे कैसे हैं, अपने बच्चों के साथ बिना फोन के दो पल खुलकर हँसिए


क्योंकि अंत में, न कोई रील साथ जाएगी, न कोई लाइक मायने रखेगा—सिर्फ और सिर्फ अपनों का साथ और उनके चेहरों की सच्ची मुस्कान ही हमारी असली पूंजी है। फोन को अपना मालिक मत बनने दीजिए, इसे सिर्फ एक उपकरण ही रहने दीजिए। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, अपनी इस खूबसूरत जिंदगी को रील्स के फ्रेम से बाहर निकालिए और अपनों को गले लगा लीजिए।


क्यों बढ़ रहा है युवाओं में आत्महत्या का अंधकार और कैसे बचाएं अपनी आने वाली पीढ़ी को?

 आज का युवा.....


उम्मीदों के बोझ और तन्हाई के साए में घुटता बचपन: क्यों बढ़ रहा है युवाओं में आत्महत्या का अंधकार और कैसे बचाएं अपनी आने वाली पीढ़ी को?


आज का दौर डिजिटल क्रांति, असीम संभावनाओं और रफ्तार का है, लेकिन इस चमक-धमक और बाहरी दिखावे के पीछे एक बेहद खौफनाक और गहरा अंधेरा भी पल रहा है—वह है हमारी युवा पीढ़ी में तेजी से बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति। आज का युवा, जो देश का भविष्य और समाज की रीढ़ है, वो डिप्रेशन, अकेलेपन, और क्षणिक असफलताओं के आगे इस कदर घुटने टेक रहा है कि वह जीवन के इस खूबसूरत सफर को बीच में ही छोड़कर हमेशा के लिए विदा हो रहा है। परीक्षा के प्राप्तांकों का दबाव, करियर की अंतहीन दौड़, एकतरफा या असफल प्रेम संबंध, सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की अंधी होड़ और अपनों के बीच बढ़ती संवादहीनता—ये सब आज किसी हँसते-खेलते युवा के लिए इतना बड़ा बोझ बन जाते हैं कि उसे मौत ही एकमात्र रास्ता नजर आने लगती है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि हमारी पूरी पारिवारिक, सामाजिक और शिक्षा व्यवस्था की एक बहुत बड़ी असफलता है, जिस पर आज गंभीर मंथन और सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

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अगर इस भयावह समस्या की जड़ों में उतरकर देखा जाए, तो इसके पीछे कई ऐसे गहरे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हैं, जिनका जिक्र करना और समाधान ढूंढना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।

सबसे पहले बात करते हैं आज की इस नई पीढ़ी (Gen Z) के उस मानसिक तनाव की, जो वे हर पल अपने भीतर महसूस कर रहे हैं। आज का युवा एक ऐसे दौर में जी रहा है जहाँ 'तुलना की संस्कृति' चरम पर है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हर कोई अपनी जिंदगी का केवल एक खूबसूरत और झूठा हिस्सा ही दिखाता है—हँसते हुए चेहरे, महंगी गाड़ियाँ, शानदार पार्टियाँ और विदेश यात्राएं। एक सामान्य और संघर्षरत जीवन जी रहा युवा जब अपनी साधारण असलियत की तुलना दूसरों के इन 'फिल्टर्ड' और बनावटी जीवन से करता है, तो उसके मन में हीनभावना घर कर जाती है। उसे लगने लगता है कि वह अपने जीवन में असफल हो गया है, जबकि उसे यह अहसास ही नहीं होता कि सोशल मीडिया का वह संसार पूरी तरह छलावा है। इसके अलावा, आज के दौर में 'तात्कालिक संतुष्टि' (Instant Gratification) की आदत बहुत बढ़ गई है। युवाओं को हर चीज तुरंत चाहिए—पल भर में सफलता, रातों-रात दौलत और हर जगह लोकप्रियता। जब जीवन में धीमापन, संघर्ष या असफलता का सामना करना पड़ता है, तो उनका यह नाजुक मन उस दबाव को झेल नहीं पाता और बिखर जाता है।

इस पूरे संकट में एक और बड़ा और गंभीर पहलू जुड़ा हुआ है, और वह है घर-परिवार के भीतर का माहौल और माता-पिता की उम्मीदों का पहाड़। आज अनजाने में ही सही, लेकिन परिजन अपने बच्चों को सफलता की एक ऐसी मशीन बना देना चाहते हैं जहाँ भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती। बचपन से ही बच्चे के कान में यह बात भर दी जाती है कि उसे डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस ही बनना है, और अगर उसके नंबर कम आए, तो उसका और उसके परिवार का भविष्य बर्बाद हो गया। शर्मा जी या वर्मा जी के बेटे से अपने बच्चे की हर रोज होने वाली तुलना बच्चे के अंदर ही अंदर घुटने पर मजबूर कर देती है। कई बार जब बच्चा परीक्षाओं में फेल हो जाता है या मनचाहा करियर नहीं चुन पाता, तो उसे लगता है कि अब वह अपने माता-पिता की नजरों में कभी नजर मिलाने लायक नहीं बचा। परिजनों का यह अति-अपेक्षात्मक रवैया और बच्चे के फेल होने पर उसे ताने देना या डांटना, उसे मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ देता है। घर जो बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह होना चाहिए था, जब वही जगह जजमेंट और दबाव का अड्डा बन जाती है, तो युवा बाहर की दुनिया में रास्ता तलाशने लगता है जहाँ अक्सर उसे गलत संगत और गलत रास्ते ही मिलते हैं।

पारिवारिक पहलुओं के साथ-साथ आज की शिक्षा प्रणाली और आर्थिक अनिश्चितता भी युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रही है। आज स्कूलों और कॉलेजों में केवलता किताबी रट्टा मारने और बड़ी डिग्रियां हासिल करने की अंधी दौड़ है। पाठ्यक्रम में जीवन के तनाव से लड़ना, मानसिक संतुलन बनाए रखना या असफलता के बाद दोबारा कैसे उठना है, इन बातों का कोई जिक्र नहीं होता। युवा जब अपनी पढ़ाई पूरी करके बाहर निकलता है, तो बेरोजगारी का भीषण संकट उसका स्वागत करता है। सालों की मेहनत के बाद भी जब नौकरी नहीं मिलती, परिवार और समाज ताने कसने लगते हैं, और आर्थिक तंगी घेर लेती है, तो युवा खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करने लगता है। उसे लगने लगता है कि उसके परिवार का उस पर जो पैसा खर्च हुआ है, वह उसका कर्ज नहीं चुका पा रहा है, और यही ग्लानि और निराशा उसे उस खौफनाक कदम की तरफ धकेल देती है।


इन सब कारणों के बीच एक और अनदेखा पहलू है—अकेलापन और संवादहीनता (Communication Gap)। आज के आधुनिक घरों में माँ, बाप और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अलग-अलग मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते हैं। किसी के पास किसी के लिए वक्त नहीं है। बच्चे के मन में क्या चल रहा है, वह अंदर से किस पीड़ा से गुजर रहा है, उसके दोस्त कौन हैं, या वह किसी बात से डरा हुआ है या नहीं—इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। जब युवा अपने दिल की बात अपने माता-पिता या भाई-बहन से साझा नहीं कर पाता, तो वह उस घुटन को अपने भीतर समेटे रहता है, जो धीरे-धीरे एक गंभीर डिप्रेशन या मानसिक बीमारी का रूप ले लेती है।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब हमें समाज के हर एक कोने से आगे आना होगा और सामूहिक प्रयास करने होंगे। सबसे पहले माता-पिता को अपनी सोच में क्रांतिकारी बदलाव लाना होगा। आपको अपने बच्चों को केवल नंबरों या किसी डिग्री के तराजू में नहीं तौलना है। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि वे अंकसूची से बहुत ऊपर हैं और आपकी जिंदगी के लिए अनमोल हैं। बच्चों को यह सिखाना बेहद जरूरी है कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने और संभलने का एक मौका है। अगर आपका बच्चा किसी परीक्षा में असफल हो जाता है या जीवन में पीछे रह जाता है, तो उस वक्त उसे डांटने या कोसने की बजाय उसे गले लगाने और उसका हाथ थामने की जरूरत होती है। घर का माहौल ऐसा होना चाहिए जहाँ बच्चा अपनी हर गलती, हर डर और हर असफलता को बिना किसी डर के खुलकर अपने माता-पिता के सामने रख सके।

इसके साथ ही, समाज और समुदाय के स्तर पर 'मानसिक स्वास्थ्य' (Mental Health) को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना होगा। हमारे समाज में आज भी अगर कोई व्यक्ति डिप्रेशन या एंग्जाइटी से जूझ रहा है और मनोचिकित्सक (Therapist) के पास जाता है, तो लोग उसे 'पागल' कहकर उसका मजाक उड़ाते हैं। इस सामाजिक कलंक को जड़ से उखाड़ना होगा। जैसे शरीर के किसी अंग में तकलीफ होने पर हम डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मन के बीमार होने पर काउंसलर की मदद लेना उतना ही सामान्य और जरूरी होना चाहिए।

युवा पीढ़ी को खुद भी यह समझना होगा कि जीवन बहुत बड़ा और खूबसूरत है, और वर्तमान की कोई भी मुसीबत या असफलता इतनी बड़ी नहीं है कि उसके लिए अपनी अनमोल सांसों को त्याग दिया जाए। आज अगर आप असफल हुए हैं, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कल आप सफल नहीं हो सकते। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, बस जरूरत है तो धैर्य रखने की और अपनों का साथ थामने की।

यह लड़ाई सिर्फ किसी एक परिवार या सरकार की नहीं है, बल्कि हम सबको मिलकर—समाज, परिवार, दोस्तों और हर एक जिम्मेदार नागरिक को—एकजुट होकर इस सोच के खिलाफ लड़ना होगा। हमें अपने आसपास के हर युवा पर नजर रखनी होगी, उसकी खामोशी को पढ़ना होगा और उसे यह अहसास कराना होगा कि वह इस दुनिया में अकेला नहीं है। आइए, आज यह पक्का संकल्प लें कि हम किसी भी युवा को निराशा के इस अंधेरे में अकेला नहीं डूबने देंगे, उसका हाथ थामेंगे, उसे सुनेंगे, और उसे बताएंगे कि उसकी एक-एक साँस इस पूरे समाज और देश के लिए सबसे ज्यादा कीमती है.......



Monday, July 27, 2026

नीट पेपर लीक और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के विरोध में बिलासपुर में निकली जन आक्रोश रैली

 नीट पेपर लीक और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के विरोध में बिलासपुर में निकली जन आक्रोश रैली

बिलासपुर –25 जुलाई 2026 को बिलासपुर में नीट पेपर लीक मामले के विरोध और दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज के प्रतिरोध में सैकड़ों युवाओं, विद्यार्थियों एवं जागरूक नागरिकों द्वारा स्थानीय गांधी चौक से सिम्स चौक तक एक विशाल और अनुशासित जन आक्रोश रैली निकाली गई, जिसका आरंभ गांधी जी की प्रतिमा पर मालयार्पण के साथ हुआ तथा मार्ग में जूना बिलासपुर, सिटी कोतवाली,


 गोलबाजार और सदर बाजार से गुजरते हुए सिम्स चौक पर सामूहिक राष्ट्रगान के साथ इसका समापन किया गया। इस रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सरकार की परीक्षा नीतियों के खिलाफ नारे लगाने के साथ एनटीए (NTA) को भंग करने,





 सोनम वांगचुक के संघर्ष का समर्थन करने तथा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को देश भर के छात्र आंदोलनों की बड़ी जीत करार दिया। इस विरोध प्रदर्शन में जेन जी के छात्र-छात्राओं, युवाओं के साथ-साथ शहर के अनेक बुद्धिजीवियों और नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिनमें प्रियंका शुक्ला अधिवक्ता, कुणाल रामटेके, नन्द कश्यप, प्रथमेश मिश्रा, प्रशांत ठाकुर, शशांक देवांगन, सूर्या शर्मा, अकरम, राजिक अली, सूरज साहू, लोकेश उइके, पूजा उइके, रजनीश श्रीवास्तव, आदर्श, प्रज्ञा मेश्राम, विवेक यादव, परदेसी रात्रे, छोटू ध्रुव, जैरी हेनरी, खालिद खान, सज्जू खान, जसबीर सिंह चावला, असीम तिवारी और कमलेश लौहरात्रे समेत ढेरों लोग उपस्थित रहे, जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था में सुधार होने तक समय-समय पर आंदोलन जारी रखने की सहमति जताते हुए अगले दिन रायपुर जाने की भी जानकारी दी।


Wednesday, July 22, 2026

बिलासपुर के NEET सफल छात्रों ने मनाया जश्न, री-नीट की चुनौतियों से पार पाकर दी प्रेरणादायक सीख

 NEET SUCCESS


बिलासपुर : NEET परीक्षा में शानदार सफलता हासिल करने वाले बिलासपुर के छात्र-छात्राओं ने अपनी कामयाबी का जश्न मनाया। इस दौरान सफल विद्यार्थियों ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता, शिक्षकों और लगातार मिली प्रेरणा को दिया। छात्रों ने री-नीट जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का जिक्र करते





 हुए कहा कि कठिन समय में परिवार और शिक्षकों का साथ ही उन्हें दोबारा खड़े होने की ताकत देता है। साथ ही उन्होंने छात्रों से किसी भी परिस्थिति में गलत कदम न उठाने और खुलकर अपने परिजनों व शिक्षकों से बात करने की अपील भी की। बिलासपुर में NEET परीक्षा में सफल हुए छात्र-छात्राओं का सम्मान और जश्न का माहौल देखने को मिला। 




सफल विद्यार्थियों ने कहा कि यह उपलब्धि केवल उनकी नहीं, बल्कि उनके माता-पिता, शिक्षकों और हर उस व्यक्ति की है जिसने मुश्किल समय में उनका साथ दिया। छात्रों ने बताया कि री-नीट की घोषणा के बाद वे भी निराश हुए थे, लेकिन परिवार और शिक्षकों के हौसले ने उन्हें फिर से मेहनत करने के



 लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि सफलता का सबसे बड़ा मंत्र लगातार अभ्यास, टेस्ट सीरीज और प्रश्नपत्रों का विश्लेषण है। एक अन्य सफल छात्र उत्कर्ष राठौर ने बताया कि री-नीट ने उन्हें अपनी पिछली रैंक सुधारने का एक नया अवसर दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों का योगदान शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वहीं अन्य विद्यार्थियों ने भी अनअकैडमी बिलासपुर सेंटर के शिक्षकों का आभार जताते हुए कहा कि हर परिस्थिति में उन्हें केवल अपना सर्वश्रेष्ठ देने की सीख मिली। छात्रों ने उन अभ्यर्थियों से भी अपील की जो असफलता से निराश हैं कि आत्महत्या कभी समाधान नहीं है, बल्कि अपने परिवार और शिक्षकों से बात कर आगे बढ़ना ही सही रास्ता है। NEET में सफलता हासिल करने वाले इन छात्रों की कहानी बताती है कि मेहनत, सही मार्गदर्शन और परिवार का भरोसा किसी भी मुश्किल को सफलता में बदल सकता है। छात्रों की यह उपलब्धि अब दूसरे अभ्यर्थियों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

ऐतिहासिक नगरी मल्हार में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की नई शाखा का हुआ शुभारंभ, क्षेत्रीय विकास को मिलेगी गति

ऐतिहासिक नगरी मल्हार में छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की नई शाखा का हुआ शुभारंभ, क्षेत्रीय विकास को मिलेगी गति

बिलासपुर :–बिलासपुर जिले के प्रमुख ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल मल्हार में आज 22 जुलाई 2026 को छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक की 629वीं और जिले की 37वीं नवीन शाखा का भव्य शुभारंभ किया गया। बैंक के माननीय अध्यक्ष  विनोद कुमार अरोरा के कर-कमलों द्वारा उद्घाटित इस समारोह में क्षेत्रीय प्रबंधक सुरेश कुमार सिंह राजपूत, कॉर्पोरेट ऑफिस से श्रीनिवासन , वरिष्ठ प्रबंधक परिचालन दिनेश कुमार चौहान, सामान्य बैंकिंग प्रभारी राहुल कुमार शर्मा, शाखा प्रबंधक


 धीरज कुमार, कार्यालय सहायक यश गुप्ता सहित स्थानीय गणमान्य नागरिक शेष नारायण गुप्ता, अवधेश कुमार, नरेन्द्र








 कुमार (संचालक, लक्ष्मी वस्त्रालय), सत्य राय और बड़ी संख्या में ग्रामीण जन उपस्थित रहे। उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए अध्यक्ष महोदय ने बैंक के विभिन्न उत्पादों की जानकारी दी और विश्वास जताया कि यह शाखा क्षेत्र के आर्थिक विकास में एक मील का पत्थर साबित होगी, साथ ही उन्होंने उपस्थितजनों को जागरूक करते हुए साइबर सुरक्षा से बचने के महत्वपूर्ण उपाय भी साझा किए........


Monday, July 13, 2026

सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग का कारनामा– विभागीय निर्देशों की अनदेखी कर शिक्षकों को बनाया जा रहा अधीक्षक

 सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग का कारनामा– विभागीय निर्देशों की अनदेखी कर शिक्षकों को बनाया जा रहा अधीक्षक


​सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग बिलासपुर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जहाँ लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के स्पष्ट आदेशों के बावजूद शिक्षकों को उनके मूल शिक्षण कार्य से मुक्त नहीं किया गया है। विभाग की ओर से प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अवहेलना करते हुए बड़ी संख्या में शिक्षकों को छात्रावासों के प्रभारी अधीक्षक का अतिरिक्त प्रभार थमाया जा रहा है। जिले में कुल 84 छात्रावासों के सापेक्ष 60 से अधिक नियमित अधीक्षक कार्यरत हैं, इसके बावजूद बिल्हा, तखतपुर, चपोरा, कुरवार, शिवतराई, जारहाभाटा, बोड़सरा और मस्तूरी जैसे विकासखंडों में नियमित अधीक्षकों की मौजूदगी के बावजूद शिक्षकों को प्रभारी अधीक्षक के रूप में तैनात रखा गया है।



 बिल्हा और तखतपुर जैसे क्षेत्रों में तो एक ही शिक्षक को दो-दो छात्रावासों का प्रभार दिया गया है, जबकि वहाँ पहले से ही नियमित अधीक्षक मौजूद हैं। जारहाभाटा कैंपस में तीन नियमित अधीक्षकों की उपलब्धता के बाद भी प्रभारी व्यवस्था बनाए रखना विभाग की मनमानी और प्रशासनिक अव्यवस्था को उजागर करता है। सहायक आयुक्त कार्यालय द्वारा नियमित अधीक्षकों को दरकिनार कर शिक्षकों को अतिरिक्त प्रभार देने का यह विकल्प विभागीय कार्य संस्कृति और शिक्षकों के मूल कर्तव्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है.......

Sunday, July 12, 2026

शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर बरसे राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी, रविंद्र सिंह के साथ की संगठनात्मक चर्चा

बिलासपुर आगमन पर राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी का जिला शहर कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र सिंह ने सौजन्य भेंट कर गर्मजोशी से स्वागत किया और इस दौरान दोनों नेताओं के बीच आगामी संगठनात्मक गतिविधियों व रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा हुई। इसके बाद, शहर में आयोजित ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए इमरान प्रतापगढ़ी ने मंच से केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वर्तमान अव्यवस्था के चलते शिक्षा विभाग पूरी तरह से आईसीयू में वेंटिलेटर पर है। उन्होंने देश भर में लगातार हो रहे पेपर लीक मामलों को छात्रों के

 भविष्य के साथ खिलवाड़ करार दिया और हाल ही में 21 छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या की घटनाओं को सिस्टम की विफलता का काला अध्याय बताया। प्रतापगढ़ी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि छात्रों की यह शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी और वे इस मुद्दे को सड़क से लेकर संसद तक पुरजोर तरीके से उठाएंगे।


 उन्होंने बिलासपुर के छात्र-छात्राओं के साथ हुए संवाद से निकले निष्कर्षों को सदन में रखने का भरोसा दिलाया और मांग की कि जब तक जवाबदेही तय करते हुए शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, तब तक कांग्रेस पार्टी छात्र हित में अपनी संघर्ष यात्रा जारी रखेगी।

Friday, July 10, 2026

होली क्रॉस सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लालखदान में विद्यार्थी परिषद का भव्य गठन समारोह हुआ संपन्न ।


बिलासपुर –होली क्रॉस सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लालखदान में विद्यार्थी परिषद गठन समारोह का आयोजन अत्यंत उत्साह एवं गरिमामय वातावरण में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इस अवसर पर भारत माता हिंदी मीडियम स्कूल के प्राचार्य फॉदर प्रमोद बारा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। एवं विशिष्ठ अतिथि रहे ग्रेंड न्यूज के संवाददाता श्री पुरुषोत्तम दुबे थे विद्यालय परिवार ने पुष्पगुच्छ एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर उनका आत्मीय स्वागत किया।कार्यक्रम में नवगठित विद्यार्थी परिषद के पदाधिकारियों को उनके दायित्वों से अवगत कराया गया तथा विद्यालय एवं समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, नेतृत्व और सेवा-भाव से कार्य करने की शपथ दिलाई गई।

समारोह को विद्यार्थियों की मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने और भी आकर्षक बना दिया। रंगारंग संगीत एवं नृत्य की प्रस्तुतियों ने उपस्थित सभी अतिथियों एवं अभिभावकों का मन मोह लिया। विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिए।मुख्य अतिथियो ने अपने प्रेरणादायक उद्बोधन में विद्यार्थियों को नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, ईमानदारी एवं जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद विद्यालय के अनुशासन एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण का सशक्त माध्यम है।


विद्यालय के प्राचार्या डॉ सिस्टर क्लेरिटा डिमैलो ने सभी नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को शुभकामनाएँ देते हुए आशा व्यक्त की कि वे विद्यालय की गरिमा को बनाए रखते हुए अपने उत्तरदायित्वों का उत्कृष्ट निर्वहन करेंगे।


कार्यक्रम का सफल संचालन विद्यालय के शिक्षकों द्वारा किया गया ।

सड़क पर गड्ढे, नाली की समस्या और अंधेरा… वार्ड के लोग बोले- कब बदलेगी तस्वीर?

 सड़क पर गड्ढे, नाली की समस्या और अंधेरा… वार्ड के लोग बोले- कब बदलेगी तस्वीर? बिलासपुर। शहर के कई इलाकों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर लोगों ...